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बिलखती आजादी का स्वच्छंद परिंदा.. (15 अगस्त पर विशेष)

August 13, 2016 8:30 pm by: Category: सम्पादकीय Comments Off A+ / A-

प्रभुनाथ शुक्ल

download15 अगस्त, 2016 को हम आजादी की 70वीं सालगिरह मानाने जा रहे हैं, लेकिन हमें एक बात बार-बार कचोटती है कि हमने अपनी आजादी के साथ न्याय नहीं किया। हम उसे सहेज नहीं पाए, जिसका नतीजा है कि हम आज अशांति, हिंसा, उग्रवाद, अतिवाद और नक्सली हिंसा का सामना कर रहे हैं। हमने अपनी आजादी को ‘निर्भया’ बना दिया।

हमने ही देश में कुछ अतिवादी विचारधारा की संस्थाएं बनाई हैं, जिसका लोग चीरहरण कर रहे हैं और हम हाथ पर हाथ रखे उनकी तमाशाबाजी देख रहे हैं।

संसद से सड़क तक एक अजीब स्थिति है। हमारे नैतिक मूल्यों के हर क्षेत्र में गिरावट आई है। भारत आज आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर विषमताओं से जूझ रहा है। यह सब क्यों हो रहा है? हमारे विचार में इसकी एक मूल वजह है हमारी आजादी की सीमा।

यक्ष प्रश्न है कि हमारा अधिकार और हमारी आजादी कहां तक है। यह बात स्वयं में भारत का हर नागरिक जानता है। उसे संविधान और उसके अधिकार बताने की आवश्यकता नहीं है। उसे अच्छी तरह मालूम है कि उसने कहां संविधान और राष्ट्र की गरिमा को चोट पहुंचाई है।

लेकिन इसके बाद भी वह सब करता है, जिसे उसे नहीं करना चाहिए। आजादी को किसी दायरे में बांधने की जरूरत नहीं है। उसके लिए हमारे संविधान में समुचित व्यवस्था है। वह हमारे संवैधानिक जंजीरों में बांधी भी गई है।

लेकिन संविधान और उसके अनुपालन की जिम्मेदारी जिन हाथों में है, शायद वे खुद अपनी जिम्मेदारी भूल गए हैं। यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना है। हमारी वैचारिक स्वतंत्रता कितनी और कहां तक होनी चाहिए, इस पर अब लक्ष्मण रेखा खींचने की आवश्यकता है। हालांकि उसकी भी आवश्यकता नहीं है। वह तो हमारे संविधान में खींची गई है, लेकिन शायद उसे बताने की जरूरत है कि अब आप हद से अधिक जा रहे हैं, जिसे हम अपनी भाषा में स्वतंत्रता का अतिरेक या अतिक्रमण कहते हैं।

हमारी स्वतंत्रता का अधिकार किस हद तक है, इस पर कभी हमने गौर नहीं किया। हमें लगता है कि आजादी के अर्थ को हमने कभी पढ़ने और समझने की कोशिश नहीं की। आजादी की शाब्दिक सत्ता से हमने कभी बाहर निकला नहीं चाहा। हमारी आजादी कितनी, कब, कहां और कैसे? अब यह जरूरी हो गया है।

स्वाधीन भारत में 70 सालों के बाद अब यह महसूस किया जाने लगा है कि वास्तव में हमें आजादी के रूप में स्वाधीनता के बजाय स्वच्छंता मिल गई। जहां स्वच्छंता होती है, वहां बेलौस और बेलगाम की स्थिति पैदा हो जाती है, जिससे हम नियंत्रण के बाहर की बात करते हैं।

हमारी आजादी कहां तक होनी चाहिए, इस पर कभी हमने गौर नहीं किया। हम वंदे मातरम नहीं बोलेंगे। हम राष्ट्रगान नहीं गाएंगे। हम कश्मीर में कालाझंडा लहराएंगे और बुरहानी वानी जैसे आतंकी को शहादत का बादशाह बताएंगे। तिरंगे को आग के हवाले करेंगे। सुरक्षा बलों पर हैंडग्रेनेड और पत्थर से हमला करेंगे। नक्सल प्रभावित इलाकों में हम बेगुनाह सेना की बारूदी सुरंगें बिछा जान लेंगे। यह सब क्यों? यह क्या, हमारी आजादी का अतिरेक नहीं है।

दुनिया का कोई धर्म क्या राष्ट्रधर्म और उसकी गरिमा, अस्मिता और अस्तित्व से बड़ा है? धर्म के निहितार्थ को हमने कभी पढ़ने की कोशिश नहीं की। धर्म को हमने अपने स्वार्थ के लिए ढाल के रूप में इस्तेमाल किया, जबकि इसका उपयोग हमें राष्ट्रीय उन्नति और उसके विकास में करना चाहिए था।

हम भारत में रहते हैं। इसका सम्मान करना हमारा फर्ज है। हमें यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि भारत हमारा भाग्य विधाता है। भारत हमें अपनी धार्मिक, मौलिक और वैचारिक स्वाधीनता के साथ अपनी-अपनी सांस्कृतिक स्वाधीनता के साथ रहने की आजादी देता है।

हमारी आवश्यकताओं की यह पूर्ति करता है। हम इसकों मां नहीं कह सकते तो कम से कम गाली देने का हमें अधिकार भी छोड़ना चाहिए। दुनिया के क्या किसी मुल्क में इस तरह की आजादी है कि जिस मुल्क में वहां के लोग रहते हों, उसी का संविधान न मानते हों।

वहां के राष्ट्रगीत और गान को न पढ़ने का फरमान जारी करते हों वहां के राष्ट्रीय ध्वज को आग के हवाले कर, उस देश के खिलाफ विरोधी नारे लगाते हों। भला ऐसी स्वतंत्रता भारत के अलावा कहां मिल सकती है।

पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा गढ़ने वालों कभी यह सोचा है कि अगर इसी तरह का नारा वे पाकिस्तान में लगाते तो उनकी क्या स्थिति होती। वंदेमातरम और जन-गण-मन का सस्वर उच्चारण गलत है। इस तरह का कोई धर्म हमें इजाजत नहीं देता है। हमारी पहली प्राथमिकता हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी हैं।

हमारी नजर में हिंदू, मुसलमान, ईसाइयत, सिखीयत कोई मायने नहीं रखती है। हम हिंदू हो न हो, मुस्लिम हो या न हो लेकिन हम सबसे पहले भारत और भारतीय हैं। हमारा धर्म भारत हमारा कर्म भारत इसके शिवाय सब बाद में आते हैं।

हिंदुस्तान में रहने वाले सभी धर्मो के लोगों का भाग्यविधाता भारत ही है और कोई नहीं। किसी भी व्यक्ति या संस्था को संविधान में मूल अधिकार प्रदान किए हैं। उन अधिकारों के संदर्भ में सभी को अपनी धर्म और संस्कृति के अनुसार आजादी है।

लेकिन यह आजादी तभी तक है जब तक राष्ट्र की गरिमा पर कोई आंच नहीं आए। हमारी धार्मिक स्वतंत्रता अगर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा बन रही है वैसी आजादी हमें नहीं चाहिए। हम ऐसे किसी धर्म की हिमायत नहीं करते हैं जो हमारी राष्ट्रीय भावना और उसके सम्मान और गरिमा पर ठेस पहुंचाए।

भारतवासियों के लिए उसका पहला धर्म राष्ट्र है इसके बाद अपनी धार्मिक स्वच्छंता है। अभी सप्ताह भर पूर्व उप्र के इलाहाबाद से एक स्कूल प्रबंधक की तरफ से राष्ट्रगान पर पाबंदी लगाने का फरमान सुना दिया गया। प्रबंधक को भारत भाग्य विधाता शब्द से एतराज है।

उनका कहना है कि जब तक भारत शब्द नहीं हटा दिया जाता स्कूल में राष्ट्रगान नहीं होंने देंगे। यह फरमान उस स्कूल प्रबंधक की तरफ से जारी किया जिसका स्कूल गैर मान्यता के चलाया जा रहा था। अब बताइए, इससे बड़ी आजादी और कहां मिल सकती है।

यह हुई न स्वच्छंता की बात। भारत शब्द को अगर वे अछूत मानते हैं फिर भारतवंशियों के खिलाफ भी कल उनका फरमान आ सकता है। यहां स्कूल की स्थापना के बाद से ही राष्ट्रगान नहीं गाया जा रहा था। 12 साल बीत गए और जिला प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी।

जरा सोचिए यह आजाद देश की आजाद विचाराधारा ही है न। भारत मां की जय, वंदेमातरम और राष्ट्रगान पर कोई यह नया विवाद नहीं है। यहां तक महाराष्ट्र विधानसभा में भी एक दल के विधायक ने सदन में गला फाड़ फाड़ कर भारत मां की जय बोलने से इनकार किया।

उन्होंने कहा, हम जयहिंद बोलेंगे लेकिन भारत माता की जय नहीं। क्योंकि भारत माता शब्द उनके लिए सांप्रदायिक लगता है। शायद यह हिंदू व्यवस्था से पोषित शब्द है। वंदेमातरम गीत ने स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाई। 24 जनवरी, 1950 को इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में संविधान में शामिल किया गया।

इसका प्रारूप स्वयं देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने पढ़ा था। अगर हम वंदेमातम पर सवाल उठाते हैं तो हमें महान शायर इकबाल की उस भावना का खयाल करना चाहिए।

‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा..’। बंकिमचंद्र चटर्जी वंदेमातरम ने बंगभंग आंदोलन में अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। यह आजादी से लेकर स्वाधीनता संग्राम तक वंदेमातरम जान से भी प्यारा गीत रहा है।

लेकिन आज इस पर बेवजह विवाद मचा है। जबकि जन-गण-मन जिसे राष्ट्रगान के रूप में गाया जाता है, यह गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की रचना है। इस स्थिति में हमें राष्ट्रवाद के खिलाफ अलगाववाद की बात करने वालों के खिलाफ एकजुट होना चाहिए।

हमें भारत की एकता, अखंडता और उसकी अस्मिता एवं गौरव के लिए सभी मतभेद भूला कर एक मंच पर आना चाहिए। राष्ट्र नीति पर राजनीति से बाज आना चाहिए।

आज कश्मीर और महिला के सुरक्षा के साथ बढ़ता भ्रष्टाचार और आतंरिक अलगावाद सबसे बड़ी समस्या है। आजादी के 70वीं सालगिरह पर हमें राष्ट्रीय एकता के संकल्प के साथ राष्ट्र निर्माण और उन्नति में आगे बढ़ना चाहिए, तभी हमारी आजादी का सपना सच होगा।

(आईएएनएस/आईपीएन)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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