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मृत्युभोज के पैसे से होते हैं सामाजिक कार्य

March 24, 2016 8:06 pm by: Category: फीचर Comments Off A+ / A-

संदीप पौराणिक 

downloadगुना, 24 मार्च (धर्मपथ)| मध्यप्रदेश के गुना जिले के भुलाय गांव के लोगों ने मृत्युभोज की परंपरा खत्म कर यह साबित कर दिया है कि अगर समाज ठान ले, तो कोई काम मुश्किल नहीं होता।

मृत्युभोज पर खर्च होने वाली राशि को भुलाय गांव के निवासी समाज हित के काम में लगाते हैं।

जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर राघोगढ़ विकासखंड में स्थित भुलाय गांव में भी मृत्युभोज की परंपरा थी, मगर गांव के कुछ युवाओं ने हरिद्वार में गायत्री परिवार के आदर्श ग्राम की संकल्पना को देखा और उसी के आधार पर गांव में मृत्युभेाज न कराने का मन बनाया।

पिछले 10 साल से मृत्युभोज बंद है। इस प्रथा में खर्च होने वाला धन गांव की गौशाला को दान में दिया जाता है। माह के अंतिम रविवार को पूरा गांव एक साथ सफाई कार्य में जुटता है। यहां के 70 फीसदी घरों में शौचालय है। इतना ही नहीं गांव में कई मुद्दों और विवादों को भी आपसी बातचीत से निपटा लिया जाता है।

गांव के एक निवासी भगत सिंह ने बताया कि उनके यहां बदलाव की शुरुआत 2005 में हुई। वे अपने साथियों छतर सिंह, महेश कुमार, देवेंद्र सिंह, मंगल सिंह, प्रकाश, अर्जुन आदि के साथ हरिद्वार के गायत्री तीर्थ शांतिकुंज गए थे। वहां उन्होंने गायत्री परिवार के आदर्श ग्राम की संकल्पना को समझा और तय किया कि वे भी इसे अपने गांव में लागू करेंगे।

ग्रामीण बताते हैं कि कुछ अरसे पहले गांव के रामप्रसाद धाकड़ के पिता का निधन हुआ था। उन्होंने मृत्युभोज न देते हुए दो लाख रुपये गौशाला को दान दे दिए। इसी तरह छोटे-छोटे दान से एक साधना कक्ष भी यहां बनाया गया है। इस कक्ष में बच्चों के लिए संस्कारशाला भी चलती है। यहां हरिद्वार का एक दंपति बच्चों को शिक्षा देता है। सारा खर्च लोग अपने स्तर पर वहन करते हैं।

गांव वालों का कहना है कि एक दशक से गांव के विवाद थाने नहीं पहुंचते। अगर विवाद होता भी है तो उसे आपस में मिल बैठकर सुलझा लिया जाता है।

बीते पंचायत चुनाव के समय भी किसी तरह का विवाद नहीं हुआ। भगत सिंह धाकड़ सरपंच का चुनाव लड़ना चाहते थे, पर जब उन्हें पता चला कि चौन सिंह यादव ने इस पद के पर्चा भरा है तो उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया। परिणामस्वरूप चौन सिंह सरपंच निर्वाचित हुए।

सरपंच सिंह ने बताया कि गांव की दुकानों पर तंबाकू से जुड़े उत्पाद न के बराबर ही बिकते हैं। गांव के पास चार-पांच साल पहले अवैध शराब की दुकान खुली थी, लेकिन लोगों ने उसे बंद करा दिया। लोग पर्यावरण को लेकर बहुत सजग हैं। परिवार में जन्मदिन और पूर्वजों की याद में गांव का हर व्यक्ति एक पौधा लगाता है। इससे गांव काफी हरा-भरा हो गया।

भुलाय गांव के लोगों की पहल पर गायत्री परिवार के मुखिया प्रणव पंड्या का कहना है कि गायत्री परिवार सामजिक नव-क्रांति का कार्य कर रहा है। उत्तराखंड के भोगपुर, उत्पाल्टा से लेकर देश के हर राज्य में कार्य हो रहे हैं। भोपाल के समीप इमलिया में भी इस प्रकार का कार्य हो रहा है।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष पंड्या की अध्यक्षता में इमलिया गांव में राष्ट्रीय गौ-विज्ञान कार्यशाला का आयोजन हुआ था। तभी से यहां पर गौमूत्र तथा इससे संबंधित कई पदार्थो से कई तरह की दवाइयां बनाना सिखाई जाती हैं। इस हुनर को सिखने के बाद कई महिलाओं ने अपना खुद का रोजगार स्थापित किया है।

अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख का कहना है कि गौ-संरक्षण, गौ-पालन, गौ-संवर्धन सबका कर्तव्य है। गौ-सेवा के साथ पंचगव्य आधारित उत्पादों की दिशा में भी कार्य होने चाहिए। बदली हुई गांव की तस्वीर आने वाले दिनों में समाज की तस्वीर बदलेगी।

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