Friday , 24 November 2017

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भ्रष्टाचार पर सिद्धांत और विचारधारा

उत्तर प्रदेश के चुनावी समर ने भ्रष्टाचार, नैतिकता, सिद्धांत और विचारधारा के मुद्दे पर तमाम राजनीतिक दलों को बेपरदा कर दिया है। हालत यह है कि पखवाड़े भर पहले संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सबसे ज्यादा मुखर रहने वाली भाजपा ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनएचआरएम) घोटाले के मुख्य आरोपी पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने से भी परहेज नहीं किया।

उसके इस आरोप में बेशक दम है कि कुशवाहा के भाजपा में आने के महज 24 घंटे के भीतर ही सीबीआई को उनके ठिकानों पर छापे मारने की सुध कैसे आ गई? मगर यह किसी से छिपा नहीं है कि खुद उसके वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया ने मुख्यमंत्री मायावती और उनके परिजनों के साथ ही कुशवाहा के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने के गंभीर आरोप लगाए थे। क्या पार्टी को यह पता नहीं था कि पूर्व परिवार कल्याण मंत्री कुशवाहा पर घोटालों में शामिल होने के साथ ही दो पूर्व सीएमओ और एक पूर्व डिप्टी सीएमओ की हत्या के मामले में संलिप्त होने के आरोप हैं?

दिल्ली से लेकर लखनऊ तक भाजपा के भीतर कुशवाहा के मुद्दे पर मचे घमासान से साफ है कि दाल में कुछ काला है। फिर कुशवाहा अकेले नेता तो हैं नहीं, जिन्हें भाजपा ने हाल ही में गले लगाया है। पूर्व मंत्री बादशाह सिंह, अवधेश कुमार वर्मा और ददन मिश्र जैसे पूर्व मंत्रियों को राजनीतिक पनाह देने के पीछे शायद उसकी यही मंशा रही है कि इन नेताओं के जरिये वह अपनी खोई जमीन हासिल कर सकती है। मगर ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भाजपा ही कठघरे में खड़ी है।

बसपा प्रमुख और मुख्यमंत्री मायावती आज खम ठोककर कह सकती हैं कि उन्होंने अपने 18-19 दागी या आरोपी मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया है। मगर इसका जवाब उनके पास भी नहीं है कि यह कदम ऐन चुनाव के समय क्यों उठाया गया? उनके पास इसका भी जवाब नहीं है कि पार्टी और सरकार से बाहर निकलने से पहले कुशवाहा को उनके उत्तराधिकारी के रूप में क्यों देखा जाता था?

उधर, सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव भले ही टिकट कटने के बाद बसपा छोड़ने वाले डीपी यादव और उनकी पत्नी को पार्टी में शामिल करने से इनकार करें, मगर उनकी पार्टी में भी इस दबंग नेता के मुद्दे पर एका नहीं है, तो इसके पीछे सिर्फ सैद्धांतिक और वैचारिक कारण नहीं हैं। कांग्रेस और अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल का मेल तो अवसरवादी गठबंधनों की ताजा मिसाल है ही। ऐसे परिदृश्य में यह कल्पना करना वाकईर् बहुत मुश्किल है कि क्या देश के सबसे बड़े प्रदेश में हो रहे चुनाव में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और नैतिकता निर्णायक मुद्दा बन पाएंगी?

भ्रष्टाचार पर सिद्धांत और विचारधारा Reviewed by on . उत्तर प्रदेश के चुनावी समर ने भ्रष्टाचार, नैतिकता, सिद्धांत और विचारधारा के मुद्दे पर तमाम राजनीतिक दलों को बेपरदा कर दिया है। हालत यह है कि पखवाड़े भर पहले संस उत्तर प्रदेश के चुनावी समर ने भ्रष्टाचार, नैतिकता, सिद्धांत और विचारधारा के मुद्दे पर तमाम राजनीतिक दलों को बेपरदा कर दिया है। हालत यह है कि पखवाड़े भर पहले संस Rating:
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