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काशी:आध्यात्मिक नगरी में व्यावसायिकता चरम पर

December 6, 2017 7:51 am by: Category: धर्म-अध्यात्म Leave a comment A+ / A-
खुले में शौच बड़ी समस्या

खुले में शौच बड़ी समस्या

हर-हर महादेव का उद्घोष मैंने सन 1999 में काशी की धरती पर किया था उस समय काशी को देखा था एक-एक गलियां अपनी स्मृति में बसायीं थीं.उसके बाद भी कई मर्तबा आना हुआ लेकिन काशी कितना बदला उस दृष्टि से समय नहीं दे पाया.सन 2017 यानि 18 वर्ष बाद का काशी जब देखने निकला तब ऐसा लगा ही नहीं की परिवर्तित व विकसित काशी में हूँ.वही दृश्यावली देखने को मिली जो 18 वर्ष पूर्व थी.

180 वर्षों की महक

180 वर्षों की महक

राजा दरवाजा के खत्री की दूकान पर जब इत्र लेने पहुंचा तब 180 वर्ष पुरानी इस दूकान के मालिक का कहना था क्या बाबू साहब हम जबसे होश संभाले यही देख रहे हैं और यही देखना भी चाहते हैं इसी में रचे-बसे हैं ,कुछ नयी इमारतें जरूर तन गयी हैं लेकिन काशी का मूल उसी पुरातन स्वरूप में ,फक्कड़ी में है.

अघोरेश्वर की इस नगरी में मणिकर्णिका श्मशान घाट से हरिश्चंद्र श्मशान घाट तक दृश्यावली बदली नहीं है.जो काशी में जीवन जीता है उसे काशी और अपने स्वयं में अंतर कर पाना मुश्किल होता होगा.

काशी का मूल आध्यात्म को व्यावसायिकता घुन की तरह खा रही 

दशाश्वमेघ घाट

दशाश्वमेघ घाट

काशी के घाट पर ही आप सम्पूर्ण काशी के दर्शन कर लेंगे ,शुरू से साफ़-सफाई ,खुले में शौच की अव्यवस्था यहाँ रही है वह अभी भी उसी स्वरूप में देखने को मिली.विकास कहीं देखने को मिला तो घाटों पर लाउडस्पीकर के कानफोडू स्वरों में ,चायनीज विद्युत्-सज्जा के रूप में .विदेशी नागरिक आज भी उसी स्वरूप में दिखते हैं जैसे मुझे 1999 में दिखे वे काशी आध्यात्म पाने न तो पहले आते थे और न ही आज उनका लक्ष्य सस्ता नशा रहा है जिसके लिए वे भारत आते रहे हैं.आध्यात्म शान्ति पूर्ण माहौल में पल्लवित होता है लेकिन गंगा आरती के बहाने बिजली की चकाचौंध और लाऊडस्पीकर के शोर ने आध्यात्म को एक किनारे कर दिया है.जिन पर भारतीय दर्शन को प्रसारित करने की जिम्मेदारी है वे भौतिक युग में सिक्कों की खनक में स्वयं भी डूब गए और आध्यात्म को भी सराबोर कर दिया ,आध्यात्म के ऊपर चमकीला मुलम्मा चढ़ा दिया गया है आध्यात्म बाहर देखने को कसमसा रहा है लेकिन धन की परत उस पर चढ़ाई जा रही है और उसकी कैद को और मजबूत किया जा रहा है.मेरे भारत ने विश्व को जो ज्ञान दिया उसे व्यावसायिक जीव चन्द रुपयों की खातिर दबा रहे हैं कुचल रहे हैं.ऐसा नहीं की विद्वान काशी में नहीं लेकिन व्यावसायिकता के चलते यदि एक हजार लोग रोज घाटों पर आरती देखने जुटते हैं वह भी आरती हो रही या माँ स्वीकार कर रही या नहीं यह किसी को नहीं पता तो उस अनुपात में उस विद्वान के पास महीने में दो-चार नए लोग ही पहुँच पाते होंगे .

ज्ञान के सागर तक पहुँचने के स्थान पर गंगा आरती के घाट पर एकत्र होना जाना मोहक और मनोरंजक है ,समाज को परोसा वही जा रहा और समाज शायद चाहता भी यही है.

कांक्रीट के विकास के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान के विकास को मॉडल बनाना होगा 

सत्ता जो विकास कर रही उसमें उसका भी उद्देश्य मात्र व्यावसायिकता है आध्यात्म के प्रसार हेतु उसका प्रयास न के बराबर है.कुछ मठ बचे हुए हैं जो इस दिशा में अपना कार्य कर रहे हैं लेकिन उनके प्रयासों को बाँध दिए जाने से उनका असर कम द्रष्टिगोचर प्रतीत हो रहा है .

अनिल कुमार सिंह वाराणसी से लौट कर 

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