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शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती: संत कभी मरते नहीं

March 3, 2018 8:40 pm by: Category: धर्म-अध्यात्म Comments Off A+ / A-

_100214194_gettyimages-51800865कांचीपुरम-तमिलनाडु के कांचीपुरम में 83 वर्ष की उम्र में इन्होने शरीर छोड़ा

स्वामी जी ने रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ा और मठ की गतिवधियों का विस्तार समाज कल्याण, ख़ासकर दलितों के शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कार्यों तक किया.

उनका जन्म 18 जुलाई 1935 में तमिलनाडु के कांचीपुरम में हुआ था. कांची कामकोटि पीठ के 69वें शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती का इस पद पर आसीन होने से पहले का नाम सुब्रमण्यम था.उन्हें 22 मार्च 1954 को चंद्रशेखेंद्र सरस्वती स्वामीगल ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, जिसके बाद वो 69वें मठप्रमुख बने थे. उस वक्त वो सिर्फ 19 साल के थे.पहले मठ कांचीपुरम और राज्य के भीतर तक सीमित था. वो इसे उत्तर-पूर्वी राज्यों तक ले गए. वहां उन्होंने स्कूल और अस्पताल शुरू किए.”उन्होंने मठ को समाज से जोड़ा, सार्वजनिक मामलों में रुचि ली और दूसरे धर्मों के नेताओं से भी अच्छे संबंध स्थापित किए.”

कांची मठ कांचीपुरम में स्थापित एक हिन्दू मठ है. यह पांच पंचभूतस्थलों में से एक है. यहां के मठाधीश्वर को शंकराचार्य कहते हैं. कांची मठ के द्वारा कई सारे स्कूल, आंखों के अस्पताल चलाए जाते हैं. उन्होंने समाज के लिए काफी काम किए थे.

स्वामी जी चर्चा में तब आए जब तमिलनाडु पुलिस ने उन्हें हैदराबाद में 11 नवंबर, 2004 को गिरफ़्तार कर लिया. उन पर कांची मठ के प्रबंधक शंकररमण की हत्या का आरोप था.

शंकररमण की हत्या 3 सितंबर, 2004 को मंदिर परिसर में कर दी गई थी. स्वामी जी को पुलिस ने शक के आधार पर गिरफ़्तार किया था क्योंकि शंकरारमन उनके ख़िलाफ़ अभियान चला रहे थे.

इसके बाद कनिष्ठ स्वामी विजेंद्र सरस्वती को 22 अन्य लोगों के साथ मामले में गिरफ़्तार किया गया. मामले की सुनवाई 2009 में शुरू हुई, जिसमें कोर्ट में 189 गवाहों को प्रस्तुत किया गया था.

सबूतों के अभाव के चलते सभी आरोपियों को पुदुचेरी कोर्ट ने 13 नवंबर, 2013 को बरी कर दिया. “यह एक राजनीतिक मामला था. कोई सबूत नहीं मिला था. मुझे नहीं लगता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने जानबूझ कर ऐसा किया होगा. लेकिन उस समय माहौल ऐसा था कि पुलिस को ऐसा करना पड़ा होगा क्योंकि डीएमके के नेता हत्या के विरोध में धरने पर थे.”

स्वामी जी की गिरफ़्तारी के बाद तमिलनाडु के मुकाबले उत्तर भारत में ज़्यादा विरोध प्रदर्शन हुए.

 

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