25 जून का दिन देश के लिए दो खट्टी-मीठी यादों के साथ ऐतिहासिक रहा है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित किया था। उन्होंने हमारे मौलिक अधिकार छीन लिए थे। वह 18 महीनों का दौर भारत में अंधा युग था। वह वर्ष 1975 था। बाद में गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस को आम चुनाव में आजादी के बाद पहली बार सत्ता से हाथ धोना पड़ा था।
25 जून का दिन देश के लिए दो खट्टी-मीठी यादों के साथ ऐतिहासिक रहा है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित किया था। उन्होंने हमारे मौलिक अधिकार छीन लिए थे। वह 18 महीनों का दौर भारत में अंधा युग था। वह वर्ष 1975 था। बाद में गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस को आम चुनाव में आजादी के बाद पहली बार सत्ता से हाथ धोना पड़ा था।
इसके ठीक आठ बरस बाद देश को क्रिकेट में मिली असाधारण सफलता, वह मीठी याद है जो सदियों तक गर्व के साथ क्रिकेट प्रेमियों को गुदगुदाती रहेगी। जी हां, इसी दिन कपिल के रणबांकुरों ने जबरदस्त उलटफेर करते हुए दो बार के लगातार चैंपियन महाबली वेस्टइंडीज को फाइनल में धूल चटा कर विश्व कप पर अधिकार किया था। एक टीम जो पिछले दो विश्व कप मुकाबलों में मात्र एक मैच पिद्दी-सी पूर्वी अफ्रीका (केन्या) से जीत सकी हो वह प्रुडेंशियल कप अपने नाम कर लेगी, यह भारत के बड़े से बड़े समर्थक के लिए भी कल्पनातीत था।
सच है कि कपिल की सेना ने जब अंग्रेजों की धरती पर कदम रखे तब उसकी जीत पर भाव बड़े से बड़े जैकपाट को भी पीछे छोड़ने वाला था। ‘एक लगाओ पांच सौ पाओ’ को आप और क्या कहेंगे!! यही नहीं टीम के तत्कालीन मैनेजर पी. आर. मानसिंह ने भी मान लिया था कि तकदीर ने साथ दिया तभी शायद सेमीफाइनल खेलें।
जीवन में मेरी जो भविष्यवाणियां गलत साबित हुई हैं, उनमें विश्व कप की अटकल भी एक है। यही कारण था कि जब भारत ने इंगलैंड को हरा कर फाइनल में प्रवेश किया, जागरण में मेरी सुर्खी लगी- ‘चमत्कारों का चमत्कार, भारत फाइनल में’। देश दबाव मुक्त था, उसको तो पाना ही पाना था, खोने को कुछ भी नहीं। एक टीम जिसने पहले ही लीग मुकाबले में इन्ही कैरेबियाइयों को पस्त किया तब भी किसी ने तरजीह नहीं दी थी सिवाय आस्ट्रेलियाई कप्तान किम ह्यूज के, जिन्होंने भारत को तब छुपा रुस्तम करार दिया था।
उस दौर में फार्मेंट ऐसा था कि हर टीम से दो-दो बार खेलना होता था लीग मुकाबलों में। क्लाइव लायड की इंडीज ने हमें हराया भी था। लेकिन हरफनमौलाओं की भरमार वाली टीम, जिसमें शतक लगा चुके विकेटकीपर किरमानी को दसवें स्थान पर बल्लेबाजी करनी पड़ती थी, अपना सफर जारी रखे हुए थी। बीच में एक बार हार की नौबत आई, जब जिम्बाब्वे ने हालत खस्ता कर दी थी। लेकिन कपिल की 175 की लाइफ टाइम इनिंग ने अफ्रीकी टीम के जबड़े से जीत छीन ली।
इंग्लैंड के लक्ष्य का पीछा आसानी से करते हुए भारत ने जब खिताबी लड़ाई में पिछले विजेताओं को सामने पाया तब भी शायद ही कोई आशान्वित रहा होगा कि क्रिकेट की काशी लार्डस की घसियाली तेज पिच पर कैरेबियाई पेस बैटरी से कपिल की टीम पार पा सकेगी। भारत जब 183 पर सीमित हुआ तब भी यही लगा कि दो बार के विजेताओं के लिए हैट्रिक बस समय की बात है। क्यों न होती ऐसी सोच। जिस टीम के पास कालजयी विव रिचर्डस, गेंदबाजों को पानी पिलाने में बेजोड़ हेंज- ग्रीनिज की ओपनिंग जोड़ी के अलावा स्वयं कप्तान लायड में कोई एक भी चलने पर लक्ष्य बौना बनना था, मगर वह दिन भारतीय हरफनमौलाओं का था, जिन्होंने बल्ले और गेंद में उपयोगी प्रदर्शन से महफिल लूटी।
मोहिंदर अमरनाथ मैन ऑफ द मैच हुए। मेरी हालत यह कि हेंज, ग्रीनिज और रिचर्डस की विदाई के बाद मैं जीत के प्रति आश्वस्त हो चला था और वही हुआ जब कपिल ने कप हाथ में उठाया। मैं आधी रात के बाद जब घर के लिए चला तब विश्वास मानिए कि पूरा बनारस शहर जाग रहा था। मैं तेजी से स्कूटर चलाते हुए जब घर पहुंचा तो पाया कि लाहौरी टोला प्रशंसकों से भरा हुआ था। चौंतरे पर बैंड के साथ शहनाई की जुगलबंदी हो रही थी। पिताजी अस्वस्थ चल रहे थे और नीचे की बैठक में लेटे थे। जब लोगों ने बाजा बंद करने को कहा तब पिताजी ने, जिनका आठ दिन बाद ही तीन जुलाई को विम्बलडन फाइनल की शाम निधन हो गया, खुशी से चहकते हुए कहा था कि सुबह तक बाजा बजते रहना चाहिए।
आज जिस क्रिकेट को देश के लोग सबसे लोकप्रिय खेल समझते हैं वे नहीं जानते कि लोकप्रियता का पैमाना क्या होता है? हमने बाद में टी-20, 2011 के विश्वकप और 2013 की चैंपियंस ट्राफी जीती, पर सच कहता हूं कि वह 83 वाली अनुभूति कभी नहीं दिखी, प्रचार माध्यमों के बाहुल्य के बावजूद। हंसिएगा नहीं, सरस्वती फाटक के चौराहे पर कैलाश पान वाले के यहां तीन हजार से ज्यादा रुपये बाजी के जमा थे। महीनों मोहल्ले के क्रिकेट प्रेमियों ने मिठाई का आनंद लिया था। शर्त यह भी थी जीतने वाला पैसा नहीं पाएगा, मिठाई आएगी.. वही हुआ.. क्या वैसा दृश्य मुझे फिर जीवन में देखने को मिलेगा? शायद नहीं..
(लेखत वरिष्ठ खेल पत्रकार और समीक्षक हैं। लेख में विचार उनके अपने हैं।)
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