चार राज्यों की चुनावी रणभेरी 2019 का लिटमस टेस्ट !

चार राज्यों की चुनावी रणभेरी का मतलब यह भी होगा कि वर्ष 2019 में खिचड़ी किसकी पकेगी। तीन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, जबकि मिजोरम में कांग्रेस की। नतीजों के ऐलान के 6 महीनों के भीतर देश में आम चुनाव होंगे, यानी केंद्र में मोदी सरकार की परीक्षा भी इन चुनावों के नतीजों जुड़ी होगी।

चार राज्यों की चुनावी रणभेरी का मतलब यह भी होगा कि वर्ष 2019 में खिचड़ी किसकी पकेगी। तीन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, जबकि मिजोरम में कांग्रेस की। नतीजों के ऐलान के 6 महीनों के भीतर देश में आम चुनाव होंगे, यानी केंद्र में मोदी सरकार की परीक्षा भी इन चुनावों के नतीजों जुड़ी होगी।

निश्चित रूप से भारतीय राजनीति के लिए इन राज्यों के नतीजे यानी 11 दिसंबर का दिन बेहद महत्वपूर्ण होगा, जब तीन हिंदीभाषी राज्य और एक विविध आदिवासी मूल के निवासियों तथा मिजोभाषी छोटे से प्रांत का नतीजा देश की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

मध्यप्रदेश में नवंबर, 2005 में पहली बार शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने और तब से लगातार अब तक यानी तीन बार और 14 साल से मुख्यमंत्री हैं। 230 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 166 जीती थीं। कांग्रेस को 57, बसपा को 4 और अन्य को तीन सीटें मिली थीं।

अब चुनौतियां तगड़ी हैं। सबसे बड़ी चुनौती जहां एंटी-इनकम्बेंसी होगी, वहीं इस बार सवर्ण समाज के लोगों की एकजुटता और मप्र की राजनीति में एकाएक उभरा संगठन ‘सपाक्स’ भाजपा और कांग्रेस दोनों के चुनावी गणित को बिगाड़ता दिख रहा है।

लेकिन जहां राजस्थान में पिछले चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, वहां इस बार कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर दिख रही है। कुल 200 विधानसभा सीटों में 160 सीट जीतने का भाजपा का रिकॉर्ड इस बार कितना रहेगा, यह खुद भाजपा में ही पूछा जा रहा है।

पिछली बार कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई थी, वहीं बसपा को 3, एनपीपी को 4 और एनयूजेडपी को 2 सीटें मिली थीं। जबकि 7 सीटों पर निर्दलीय जीते थे। हर चुनाव में सरकार बदल देने के लिए पहचान बना चुके राजस्थान में वसुंधरा राजे का जादू कितना चलेगा, कहना जल्दबाजी होगी।

सन् 2000 में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ में केवल तीन साल ही कांग्रेस सत्ता में रही, उसके बाद 2003 यानी लगभग 15 बरस से लगातार रमन सरकार है। छत्तीसगढ़ के सियासी हालात भी लगभग राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे ही दिख रहे हैं। यहां भी भाजपा को एंटी-इनकम्बेंसी का डर सता रहा है, लेकिन कांग्रेस भी अपने पुराने साथी अजीत जोगी के नए दल ‘छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस’ और मायावती के गठबंधन से परेशान जरूर है।

जोगी ने मायावती के साथ गठबंधन कर कांग्रेस का समीकरण बिगाड़ा है, वहीं गोंडवाना पार्टी भी नाक में दम किए हुए हैं। पिछली बार भाजपा को 49, कांग्रेस को 39, बसपा को 1 और अन्य को एक सीट मिली थी।

पूर्वोत्तर का राज्य मिजोरम 1987 में अस्तित्व में आया था। यहां पहली बार वर्ष 1989 में कांग्रेस की सरकार बनी थी, जो लगातार दो बार सत्ता में रही। फिर दो बार मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार रही। वर्ष 2008 से कांग्रेस फिर सत्ता में है। कुल 40 विधानसभा सीटे हैं। वर्ष 2013 के चुनाव में कांग्रेस को 34, एमएनएफ को 5 और और एमपीसी को 1 सीट मिली थी। इस बार चौथे दल के रूप में भाजपा भी चुनाव में चुनौती को तैयार है।

कोई कुछ भी कहे, किसान आंदोलन, पेट्रोलियम की कीमतों में उछाल, बाढ़, नोटबंदी की हकीकत और बेरोगजगारी के असल आंकड़ों की सच्चाई के बीच चार राज्यों में होने जा रहे चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए वर्ष 2019 का लिटमस टेस्ट बनेंगे। देखना यही है कि चारों राज्यों में भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर में कौन कितना किस पर भारी पड़ता है। (आईएएनएस)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं)

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