रायपुर, 17 नवंबर – छत्तीसगढ़ में नसबंदी शिविरों में हुई गड़बड़ी और मौतों के पीछे की वजह मात्र 150 रुपये है।
दरअसल, राज्य में नसबंदी का एक मामला लाने पर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और मितानिनों को राज्य सरकार प्रोत्साहन राशि देती है। यह प्रोत्साहन राशि 150 रुपये प्रति मामले के हिसाब से होती है।
मितानिनें, जननी स्वास्थ्य सुरक्षा और परिवार नियोजन के बीच की कड़ी होती हैं। राज्य सरकार का लक्ष्य पूरा करने के दबाव के चलते और 150 रुपये प्रति मामले में प्रोत्साहन राशि के लालच में स्वास्थ्य कार्यकर्ता और मितानिनें गांव-गांव जाकर ऐसी महिलाओं की तलाश करती थीं जो दो-तीन बच्चों की मां हैं।
ये मितानिनें इन महिलाओं को पैसे का लालच देकर उन पर नसबंदी कराने का दबाव डालती थीं। अगर कोई महिला उनकी इस बात पर असहमति जताती तो मितानिनें उनके पति पर दबाव बनाना शुरू कर देतीं ताकि प्रोत्साहन राशि पक्की हो सके।
इस लालच में इन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और मितानिनों ने बैगा जनजाति की सैकड़ों महिलाओं की भी नसबंदी करवा दी, जबकि बैगा जनजाति को संरक्षित श्रेणी में रखा गया है। इस जनजाति की महिलाओं की नसबंदी पर रोक है, लेकिन लक्ष्य को पूरा करने के लिए मौत के इन नसबंदी शिविरों में नियमों को ताक पर रख दिया गया।
पेंडारी नसबंदी शिविर से उठा मौत का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह शिविर 122 महिलाओं को नसबंदी के नाम पर जीवनभर का दर्द दे गया है। अभी तक 16 महिलाओं की मौत चुकी है। वहीं मितानिनों के खिलाफ शिकायत मिली है कि वे सरकार द्वारा दी गई राशि के अलावा नसबंदी कराने वाली महिलाओं की प्रोत्साहन राशि से भी अपना हिस्सा लेती हैं।
ऐसी शिकायतें पेंडारी के शिविर के बाद मिली हैं। इस शिविर में नसबंदी के लिए लाई गईं ज्यादातर महिलाओं के ऑपरेशन के लिए न तो पति से अनुमति ली गई, न ही परिजनों से।
अमसेना की, फूलबाई श्रीवास की भी ऑपरेशन के बाद मौत हो गई। अमसेना के जेठ पीतांबर श्रीवास ने बताया कि जैसे ही नसबंदी करवाने वाली महिलाओं की तबियत बिगड़ने लगी, वैसे ही स्वास्थ्य विभाग के कुछ कर्मचारी घर पहुंचे थे। उन लोगों ने फूलबाई को विभाग से दी गई दवाइयों के बारे में पूछा और जिलाधिकारी का निर्देश बताकर दवाइयां ले गए।
वहीं एक और मृतका के देवर महेश सूर्यवंशी ने कहा, “मितानिन अर्चना दुबे हमारे घर आई थीं, तब वहां न मेरे भाई थे, न मैं। भाभी नेमबाई तीनों बच्चों के साथ घर पर थी। मितानिन नसबंदी ऑपरेशन की बात कह बहला-फुसलाकर उन्हें ले गई। ऑपरेशन के लिए उनके पति से अनुमति भी नहीं ली गई थी।”
महेश ने बताया कि पेंडारी के अस्पताल में नसबंदी की गई। कुछ ही देर में ऑपरेशन के बाद वापस भेज दिया गया। कुछ घंटे तो ठीक गुजरे, फिर उन्हें उल्टी और छाती में जलन होने लगी। उनकी हालत लगातार बिगड़ते देख हम उन्हें जिला अस्पताल ले गए। वहां भी वार्डब्वॉय ने उनका इलाज किया। डेढ़ महीने पहले ही भाभी की डिलिवरी हुई थी, इसलिए उनका ऑपरेशन नहीं होना था।
मृतका दीप्ति यादव के पति धन्ना यादव ने बताया, “मेरी पत्नी गांव की मितानिन के कहने पर नसबंदी करवाने के लिए शिविर में गई थी। नसबंदी होने के बाद से ही उसे उल्टियां होने लगीं। हमने स्वास्थ्य कार्यकर्ता को बताया। कार्यकर्ता ने हालत बिगड़ते देख इसकी जानकारी मोबाइल पर बीएमओ डॉ. प्रमोद तिवारी को दी। उन्होंने मरीज को सिम्स ले जाने की सलाह दी। सिम्स में उसकी मौत हो गई।”
राज्य में बड़े पैमाने पर हुई इस लापरवाही के लिए राज्य सरकार की हर तरफ किरकिरी हो रही है। वहीं पूरे प्रदेश की जनता छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग की कारगुजारियों से खासा नाराज है।
मामले में राज्य सरकार ने लापरवाही के आरोप में चार अफसरों को निलंबित कर दिया है, और सर्जन डॉ. आर. के. गुप्ता और उनकी टीम पर चकरभाठा थाने में धारा 304 के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया गया है। लेकिन पीड़ित परिवारों के परिजन इस कार्रवाई से खुश नहीं हैं।
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