डब्ल्यूटीओ में न्याय को कमजोर करने का अमेरिका पर आरोप

जेनेवा, 1 जून (आईएएनएस)। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के वर्तमान न्यायाधीश को दूसरे कार्यकाल के लिए नियुक्त करने पर अमेरिका की आपत्ति से इस संगठन की स्वतंत्रता एवं प्रभावकता कमजोर होगी। बुधवार को मीडिया रपट में यह बात कही गई है।

अमेरिका ने पिछले हफ्ते डब्ल्यूटीओ के अन्य सदस्य देशों को बताया कि वह न्यायाधीश सेउंग वा चांग को डब्ल्यूटीओ की अपीली संस्था में दूसरे कार्यकाल के लिए नियुक्त करने का समर्थन नहीं करेगा। चांग दक्षिण कोरिया के हैं, डब्ल्यूटीओ के न्यायाधीश के रूप में उनके चार साल का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। यह संस्था डब्ल्यूटीओ के सदस्यों के विवाद सामने आने पर समितियों की रपट पर अपील की सुनवाई करती है।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ के मुताबिक, डब्ल्यूटीओ का 20 साल पहले जब गठन हुआ था, उसी समय से वर्तमान सदस्य को सेवा का दूसरा चार साल का कार्यकाल देने की परंपरा रही है। पिछले साल अमेरिका और भारत के वर्तमान सदस्यों को दूसरा कार्यकाल दिया गया था।

मीडिया रपट में कहा गया है कि अमेरिका ने चांग का विरोध उनकी न्यायिक क्षमता या स्वतंत्रता की कमी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए किया है क्योंकि उन्होंने अमेरिका के खिलाफ एक फैसले में हिस्सा लिया था।

हटने वाले कोरियाई सदस्य पर आरोप है कि वह शुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता यानी जनरल एग्रीमेंट ऑन टेरिफ एंड ट्रेड (जीएटी)/डब्ल्यूटीओ करारों से तीन मामलों में विचलित हुए।

अपीली संस्था के छह सदस्यों ने कहा, “खास मामलों से किसी सदस्य के दोबारा नियुक्ति को जोड़ने से भरोसे पर प्रभाव पड़ सकता है। चांग ने रपटों की गुणवत्ता बनाए रखने एवं हमारी रचनात्मक बेहतरी की सहायता करने के लिए हमलोगों के साथ में कड़ी मेहनत की है। सदस्यों ने चांग की निष्पक्षता, ईमानदारी एवं स्वतंत्रता की सराहना की है।”

कैलिफोर्निया इर्विन विश्वविद्यालय के एक विधि विशेषज्ञ ग्रेगरी शेफर ने कहा कि अमेरिका ने सक्रियता के साथ दूसरों पर नियम लागू कराने के लिए डब्ल्यूटीओ विवाद निपटारा व्यवस्था का इस्तेमाल किया है, लेकिन यदि देश इस व्यवस्था की साख को नष्ट कर देगा तब यह अविश्वसनीय हो जाएगा।

उन्होंने चेतावनी दी कि यह एक ऐसे प्रशासन के लिए एक बहुत जोखिम वाली रणनीति है, जो दावे के साथ खुद को अंतर्राष्ट्रीयतावादी कहता है।

उन्होंने कहा, “एक वैश्विक तंत्र बनाने का असली कारण एक तीसरे पक्ष वाली संस्था बनाना है, जो ऐसे विवादों को जो अंतत: अंतर्राष्ट्रीय कल्याण, शांति और सुरक्षा को खतरे में डाले, उन्हें सुलझाने में मदद करे।”

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