जोहान्सबर्ग, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति थाबो म्बेकी का गुप्ता परिवार से कोई संबंध नहीं है और न ही उन्होंने अपने उत्तराधिकारी राष्ट्रपति जैकब जुमा से उस परिवार का परिचय कराया। थाबो म्बेकी फाउंडेशन ने यह बात सोमवार को कही।
इस आशय का बयान फाउंडेशन की ओर से तब आया है, जब गुप्ता परिवार पर कथित रूप से सरकार पर अनुचित प्रभाव डालने का आरोप लगाया जा रहा है।
समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, फाउंडेशन ने ई-मेल के जरिए बयान जारी कर इस आरोप को खारिज किया कि भारतीय मूल के गुप्ता परिवार और म्बेकी के बीच कोई संबंध है।
फाउंडेशन ने कहा, “विगत तीन सप्ताहों से हमलोगों ने खबरों में पाया है कि कई लोग दावा कर रहे हैं कि पूर्व राष्ट्रपति थाबो म्बेकी और गुप्ता परिवार के बीच संबंध है।”
फाउंडेशन ने यह भी कहा, “इस बात को लेकर हमलोग चिंतित हैं। जवाब देने से बचते हुए आरोपों की तह तक गए।”
पूर्व राजनीतिक कैदी संघ के अध्यक्ष मफो मेसेमोला ने रविवार को दावा किया था कि म्बेकी ने गुप्ता परिवार को राष्ट्रपति जुमा से परिचय कराया था।
फाउंडेशन ने कहा, “यदि यह सही भी है कि पूर्व राष्ट्रपति मबेकी ने गुप्ता परिवार को राष्ट्रपति जुमा से मिलवाया था। फिर भी, उसके बाद गुप्ता परिवार और जुमा के बीच संबंधों को लेकर जो कुछ निकल कर आया है, उसके लिए म्बेकी को तब तक जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह साबित नहीं हो जाता है कि उन्होंने गलत इरादे से उस परिवार को राष्ट्रपति से मिलवाया था।”
फउंडेशन ने मेसेमोला को सुझाव भी दिया कि नैतिक फसले की क्षमता नहीं होने के लिए उन्हें राष्ट्रपति जुमा पर आरोप लगाना चाहिए।
राष्ट्रपति जुमा से घनिष्ठ संबंधों को लेकर गुप्ता परिवार विवाद में फंस गया है। कहा जाता है कि गुप्ता परिवार सत्ताधारी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के सदस्यों को मंत्रिमंडलीय पद की पेशकश कर दक्षिण अफ्रीकी सरकार पर कथित रूप से अनुचित दबाव डाल रहा है।
फाउंडेशन ने इस बात से भी इन्कार किया कि जब मबेकी राष्ट्रपति थे तो गुप्ता परिवार के कोई भी सदस्य कभी उनके आर्थिक सलाहकार थे।
फाउंडेशन ने कहा कि यह सत्य है कि अजय गुप्ता ने अंतर्राष्ट्रीय विपन्न परिषद (आईएमसी) बोर्ड, जो अब (ब्रांड दक्षिण अफ्रीका) है में अपनी सेवाएं दीं।
फाउंडेशन ने कहा कि तत्कालीन मंत्री एस्सोप पहद की अनुशंसा पर अजय गुप्ता बोर्ड के साथ समझौता कर आईएमसी में शामिल हुए थे। चाहे गलत हो या सही, लेकिन तत्कालीन मंत्री एस्सोप पहद ने सोचा कि गुप्ता के पास परिषद के कार्य करने की क्षमता और ज्ञान था, न कि राष्ट्रपति से उनकी कथित घनिष्ठता के कारण ऐसा फैसला किया गया।
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