पौधों में भी होती है आत्मरक्षा की प्रवृत्ति

न्यूयार्क, मई 23 (आईएएनएस)। शाकाहारियों के लिए एक चेतावनी! यदि आप कोई शाकाहार लेने जा रहे हैं तो थोड़ा सावधान रहें, क्योंकि पौधे भी प्रतिक्रिया करते हैं।

मिसौरी विश्वविद्यालय (एमयू) के अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, पौधे उस ध्वनि को पहचानते हैं जो उनके चबाने के दौरान पैदा होती है, लिहाजा वे आसन्न खतरे के खिलाफ सावधान हो जाते हैं और आवश्यक प्रतिक्रिया करते हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि इल्ली जब किसी पौधे को खाती है और उस दौरान जो ध्वनि पैदा करती है, उसपर पौधों ने प्रतिक्रिया की और अपनी रक्षा के उपाय किए।

‘डेली मेल’ की एक रपट के अनुसार, अध्ययन में कहा गया है कि इल्लियों ने जब पौधों को खाना शुरू किया तो पौधों ने अधिक मात्रा में सरसों का तेल उत्सर्जित किया, ताकि इल्लियां दूर भाग जाएं।

लेकिन इन्हीं पौधों ने हवा की ध्वनि के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं की, जबकि हवा से भी उसी तरह के ध्वनि प्रभाव पैदा हुए।

इस अध्ययन में इल्लियों को एराबिडोप्सिस नामक पौधे पर छोड़ा गया, जो बंदगोभी और सरसों की प्रजाति का फूलों वाला एक छोटा पौधा है। अब इल्लियों ने पौधे को चबाना शुरू किया और अनुसंधानकर्ताओं ने इसके जवाब में पौधे में पैदा हुई हरकत को एक लेजर के जरिए मापा।

शोध दल के प्रमुख रेक्स कोक्रॉफ्ट ने कहा है, “यह जानना रोचक है कि जब पौधे पर इल्ली की प्रतिक्रिया से पैदा होने वाली ध्वनि से मिलती-जुलती ध्वनि, जैसे हवा या किसी अन्य कीट की ध्वनि, पौधे के पास पैदा की गई तब पौधे ने कोई रक्षात्मक प्रतिक्रिया नहीं की।”

एमयू के वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक हीदी एपेल का कहना है कि इल्लियां पौधों की रासायनिक प्रतिक्रिया के बाद खुद को समेटना शुरू कर देती हैं। यानी इस तरह के कंपन के इस्तेमाल के जरिए पौधों का रक्षा कवच बढ़ाया जा सकता है और यह कृषि में उपयोगी हो सकता है।

हालांकि शोध दल अभी इस पर आगे काम करेगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पौधे इस कंपन को कैसे पहचानते हैं, किस प्रकार के कंपन संकेत उनके लिए महत्वपूर्ण हैं और पौधों के इस गुण का उपयोग कीटों के नियंत्रण में कैसे किया जा सकता है।

यह अध्ययन ‘ओएकोलोगिया’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

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