मध्य एशिया में आतंकवाद की रोकथाम में अहम भूमिका निभा सकता है एससीओ

पत्रिका ‘नेशनल स्ट्रेटजी इशू’ मुख्य संपादक और ‘रशियन इंस्टिट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज’ के विशेषज्ञ अज्दार कुर्तोव ने एक साक्षात्कार में कहा, “आतंकवाद की रोकथाम के लिए उठाए जाने वाले अहम कदमों में एससीओ के आतंकवाद-रोधी क्रिया-कलापों से जुड़े संरचना तंत्र को मजबूत करना, जिसके तहत आतंकवाद-रोधी केंद्रों का संचालन एवं सुरक्षा सेवाएं शामिल हैं, और सदस्य देशों के बीच सूचनाओं का आदान प्रदान शामिल है।”

कुर्तोव ने कहा कि इससे शुरुआती चरण में ही संदिग्ध आतंकवादी की पहचान करने, उनके सूचना नेटवर्क पर रोकथाम लगाने और उन्हें आर्थिक मदद मुहैया कराने वाले नए स्रोतों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगा।

एससीओ 2001 में अपनी स्थापना के बाद से लगातार सुरक्षा के क्षेत्र में हर तरह का समन्वय स्थापित करने में सफल रहा है। क्षेत्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए ‘तीनों मुख्य खतरों- आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद’ के खिलाफ लड़ने के लिए एक गुट की स्थापना को प्राथमिकता दी गई और 2004 में शंघाई सहयोग संगठन की क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (आरसीटीएस) को स्थापित किया गया।

कुर्तोव ने कहा, “मध्य एशिया में खनिज संसाधनों की भरमार के कारण आतंकवाद का खतरा अधिक है और इसीलिए यह चरमपंथियों को आकर्षित करता रहा है।”

कुर्तोव ने सुझाव देते हुए कहा कि एससीओ को आपसी वार्ता के कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए और मध्य एशिया के देशों के बीच आपसी समझ को बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए।

रूस के बारे में कुर्तोव का मानना है कि उत्तरी काकेशस में सुरक्षा के मुद्दे प्रमुख हैं, क्योंकि यह क्षेत्र सीरिया, इराक और तुर्की के काफी करीब हैं, आतंकवादी काफी सक्रिय हैं। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि रूस ने इस क्षेत्र में आर्थिक और सामाजिक स्थिति के सुधार का लक्ष्य रखते हुए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।

विशेषज्ञ ने कहा, “एससीओ इस तरह की परियोजनाओं को लागू करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह परियोजनाएं युवाओं को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने से रोकने में मददगार होंगी।”

कुर्तोव ने यह भी कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद दुनिया के ताकतवर देशों जैसे अमेरिका के समर्थन के बिना इतनी तेजी से नहीं फैल सकता।

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