यहां आजादी के दीवानों ने शुरू की थी दुर्गा पूजा

imagesपटना, 25 सितंबर- पूरे बिहार में दुर्गापूजा की तैयारी अंतिम चरण में है। मां दुर्गा के लिए पंडालों का निर्माण लगभग पूरा हो गया है, वहीं मूर्तिकार दुर्गा प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में लगे हुए हैं।

बिहार की राजधानी पटना में कई स्थानों पर विभिन्न पूजा समितियां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कराती हैं, लेकिन राजधानी के लंगरा टोली स्थित बंगाली अखाड़ा की पूजा सबसे अलग मानी जाती है। यहां की पूजा समिति का प्रारंभ उन स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी जिन्होंने अंग्रेजों से बचने के लिए यहां दुर्गा मंदिर की स्थापना की थी।

यहां 123 वर्षो से दुर्गा पूजा का आयोजन होता आ रहा है। यहां की पूजा बंगाली पद्धति से होती है। जानकार बताते हैं कि पटना में छह स्थानों पर बंगाली पद्धति से पूजा होती है जिनमें यह सबसे पुरानी जगह है।

बंगाली अखाड़ा के इतिहास के विषय में पूजा समिति के वर्तमान सचिव शुभेंदु घोष ने बताया कि बंगाली अखाड़ा का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। अखाड़ा शब्द के विषय में पूछने पर उन्होंने बताया कि वर्ष 1893 से पूर्व यहां कुश्ती होती थी जिस कारण इसका नाम अखाड़ा पड़ गया।

यहां स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दीवाने जुटते थे और अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए रणनीतियां तैयार की जाती थी। रणनीतियां बनाने में कोई परेशानी न हो और अंग्रेजों को शक भी न हो इसके लिए यहां दुर्गा मंदिर की स्थापना की गई थी। दुर्गा मंदिर की स्थापना के बाद यहां वर्ष 1893 से नवरात्र के मौके पर दुर्गा पूजा होने लगी।

समिति के उपाध्यक्ष समीर राय बताते हैं कि यहां की पूजा की कई विशेषता है। उन्होंने बताया कि यहां दुर्गा पूजा के मौके पर बनने वाली सभी प्रतिमाएं एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं जबकि मां दुर्गा की प्रतिमा को पहनाई गई साड़ी काट-छांट के बगैर पहनाई जाती है।

उन्होंने बताया कि बंगला पद्धति में धुनुची नृत्य का खास महत्व है। सप्तमी और नवमी तक आरती के समय धुनुची नृत्य यहां आने वाले लोगों के लिए खास आकर्षण होता है। भक्त मां की आरती के समय भाव-विहवल हो जाते हैं। यहां विजयादशमी के दिन मां की विदाई चूड़ा-दही खिलाकर करने की परंपरा है जिसका निर्वहन आज भी हो रहा है।

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