रहमतों का माह है रमजान

मान्यता है कि रमजान के महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और दोजख के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। शैतानों को जंजीरों में जकड़ दिया जाता है।

रमजान के बारे में पैगंबर-ए-इस्लाम फरमाते हैं कि अगर इंसान को यह मालूम होता कि रमजान क्या चीज है तो मेरी उम्मत यह तमन्ना करती कि पूरे साल रमजान हो। रमजान महीने का पहला अशरा (दस दिन) रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत व तीसरा अशरा दोजख से आजादी दिलाने का है।

लखनऊ की टीले वाली मस्जिद के मौलाना फजलुर रहमान फरमाते हैं कि पवित्र रमजान माह में एक ऐसी रात होती है जो हजार महीनों से अफजल है। इसे शब-ए-कद्र की रात कहा जाता है। हदीस में कहा गया है कि शब-ए-कद्र को रमजान माह की आखिरी दस दिनों की ताक रातों 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं व 29वीं रात को तलाश करना चाहिए। अधिकांश आलिम 27वीं रब को शब-ए-कद्र मानते हैं।

मौलाना का कहाना है कि रमजान में रोजदारों को सहरी खाना चाहिए। अल्लाह व उसके फरिश्ते सहरी के खाने वालों पर दुरुद भेजते हैं। रोजा बदन की जकात है। हर मुसलमान रमजान में रोजा रखे और अल्लाह की इबादत करे।

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