वर्चस्व और वासना के घेरे

0,,17549643_403,00पत्रकार तरुण तेजपाल का मामला लोग भूले भी नहीं थे कि पर्यावरण विशेषज्ञ डॉक्टर आरके पचौरी पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों ने देश में स्त्री विरोधी हिंसा की बहस को फिर सुलगा दिया है. वर्चस्ववादी समाज की गांठें खुल रही हैं.

ये साबित होना बाकी है कि पचौरी पर लगे आरोप कितने सही हैं लेकिन एक बात ये भी साफ होती है कि 2013 के यौन हिंसा निरोधी कानून का कोई डर किसी को रहा नहीं. न जाने ऐसे कितने मामले होंगे- तरुण तेजपाल और आरके पचौरी क्योंकि नामचीन किरदार हैं लिहाजा मीडिया में भी उनकी खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं. लेकिन देश में ऐसे कितने कार्यस्थल, ऐसे कितने दफ्तर, ऐसे कितने संगठन होंगे जो सौ प्रतिशत ये दावा कर सकें कि उनके यहां कार्यरत महिलाओं के लिए सौ फीसदी सुरक्षित माहौल है और उनके यहां कभी स्त्रीविरोधी आचरण नहीं हुआ है.

ये देश यौन हिंसा से घिरा हुआ देश हो गया है. एक सड़ी हुई यौन कुचेष्टा पुरुषों के जेहन में खदबदा रही है. और स्त्रियां किसी तरह खुद को समेटे हुए किसी तरह अपने साहस और सामर्थ्य में काम पर जाती हैं, दफ्तर में रहती हैं और घरों को लौटती हैं. घरों की चारदीवारियों के भीतर घरेलू हिंसा है तो बाहर निकलते ही बुरी निगाहों और फब्तियों का एक घृणित सिलसिला, फिर बसों, ट्रेनों, ट्रामों, ऑटोरिक्शा, टैक्सियों में छेड़छाड़ और यौन हमलों से बचे रहने की जद्दोजहद और फिर दफ्तरों में कामकाज के तनाव के बीच यौन आतंक के प्रकट अप्रकट घेरे. इस तरह घर में रहती और घर से काम पर निकलती महिला के लिए पुरुषवादी मानसिकता के कंटीले बाड़े हर ओर बिछे हैं.

चिंता ये है कि ये बाड़े और ऊंचे होते जा रहे हैं. कोई कानून, कोई सजा, कोई गुजारिश वहशियों और अपने जेहन में गंदगी छिपाए पुरुषों को रोकने में नाकाम दिखती हैं. ऐसा यौन कुंठित और हमले पर उतारू समाज हमारा होता जा रहा है. फिर आप लाख स्त्री अधिकार, गरिमा और सम्मान की कितनी लिजलिजी और गर्वीली बातें कर लीजिए, कुछ नहीं होता है.

उस लड़की के साहस की दाद देनी होगी जिसने बहुत अत्यधिक दबाव के बीच आखिरकार पचौरी जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके दिग्गज शख्स के खिलाफ बोलने का फैसला किया. हम नहीं जानते कि अदालत में जाने के बाद इस मामले की परिणति क्या होगी. मामले से जुड़ी क्या सच्चाइयां हैं- हम बेशक ये सब नहीं जान सकते लेकिन इतना तो समझ में आता ही है कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता का हमारे समाज के भद्रजनों का अब कोई न तो विवेक रह गया है न कोई नैतिक इरादा. वे यौन कुंठा और यौन पिपासा में ढेर हो चुके हैं. वे एक बार सत्ता और ताकत की सीढ़ियां लांघकर कहीं ऊंची जगह विराजमान हो जाते हैं तो उन्हें लगता है कि नीचे वाले लोग- फिर वे स्त्री हों या पुरुष- उन्हें कभी भी कैसे भी दबोचा जा सकता है या धकेला जा सकता है. जो फिंकवा दिए जाने से या सरेंडर कर देने से इनकार कर देते हैं उन्हें अपने साहस की बड़ी कीमतें चुकानी पड़ती हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे जरूर हैं जो किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं होते. शायद ऐसे ही लोगों से समाज और लोकतंत्र की सांसे चल रही होंगी.

असल में औरतों के साथ व्यवहार को लेकर आमतौर पर भारतीय पुरुष मिथकों और भ्रमों से काम चलाता है. उसके पास न कोई समझ है न दृष्टि. विवेक तो छोड़ ही दीजिए. अगर किसी पुरुष की कोई सहकर्मी उससे घुलमिलकर बात करती है या उसके प्रति संवेदना दिखाती है या हल्काफुल्का व्यवहार करती है तो पुरुष के तंत्रिका तंत्र के अंधेरों में छिपा मालिकाना मिजाज तड़कने लगता है. उसे लगने लगता है कि ये स्त्री उसकी है और उसके प्रति समर्पित होने से बस कुछ कदम दूर है. वो उस पर झपटने की चेष्टा करता है, उसे अपने घेरे में लेने की भरसक तिकड़में करने लगता है- उसे मर्यादा नहीं आती.

पुरुषवादी वर्चस्व की घिनौनी दास्तान यही है. और बात सिर्फ भारत की नहीं. दुनिया में हर कहीं यही हो रहा है क्योंकि पूरी दुनिया के समाजों के बुनियादी ढांचे में ही खोट है. वो बराबरी का और गरिमा का ढांचा नहीं है वो वर्चस्व का नफरत का और शोषण का ढांचा है जिसमें एक ओर ताकतवर तबका है और दूसरी ओर वंचित शोषित कमजोर तबके हैं. स्त्रियों को गुलाम मानने की मानसिकता आज की नहीं है. सदियों से ये बेड़ियां समाजों पर पड़ी हैं. उन्हें तोड़ने की कोशिशें बेशक होती रही हैं लेकिन न जाने कैसे नई बेड़ियां और नये वहशी आते जाते हैं.

dw.de से

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