क्रिकेट की क्रांति का ताराः सचिन

0,,17149767_303,00सोलह साल की उम्र में जब सचिन तेंदुलकर ने सफेद कपड़े पहन कर अंतरराष्ट्रीय ग्राउंड में कदम रखा, तो वेस्ट इंडीज दुनिया की सबसे मजबूत टीम हुआ करती थी और दक्षिण अफ्रीका को तब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने की इजाजत नहीं थी. उस वक्त किसी ने ट्वेन्टी 20 क्रिकेट का नाम भी नहीं सुना था.

तब तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि क्रिकेट के किसी जमाने में डकवर्थ लेविस सिस्टम, पावरप्ले और स्निको जैसे टर्म सुनने को मिलेंगे. तब यह भी किसी ने नहीं सोचा था कि इंग्लैंड के ईजाद किए गए खेल का मुख्यालय हजारों मील दूर दुबई में बन जाएगा.

क्रिकेट का बदला मुख्यालय

भले ही दुबई अब क्रिकेट काउंसिल यानी आईसीसी का मुख्यालय हो लेकिन क्रिकेट की दुनिया यह जानती है कि वहां से कुछ हजार किलोमीटर दूर भारत ही है, जो अब क्रिकेट को नियंत्रित करता है. क्रिकेट की बाइबिल कही जाने वाली विजडन के संपादक लॉरेंस बूथ का मानना है कि एक अरब जनता वाला भारत क्रिकेट का दीवाना है और निश्चित तौर पर वही अब क्रिकेट का पावरहाउस भी बन चुका है. उनका कहना है, “क्रिकेट को कभी यह दर्जा नहीं मिला था, जब से दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाला देश इसे अपना राष्ट्रीय खेल समझने लगा है.” हालांकि क्रिकेट भारत का राष्ट्रीय खेल नहीं है. सचिन तेंदुलकर ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है.

उनका कहना है कि दूसरे देशों के लिए भारत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात होती जा रही है, “कम समृद्ध देश भारत के लिए मेजबानी करना चाहते हैं क्योंकि इससे उन्हें भारी भरकम टीवी डील मिलती है. एशियाई टेलीविजन चैनलों पर क्रिकेट खूब चलता है.” यह दौर निश्चित तौर पर सचिन तेंदुलकर का दौर था.

कैसे चमका उप महाद्वीप

बूथ 1996 का जिक्र करते हैं, जब दूसरी बार वनडे विश्व कप भारतीय उप महाद्वीप में आयोजित किया गया था. उनके मुताबिक श्रीलंका की जीत के साथ दक्षिण एशिया का क्रिकेट में नया मुकाम आ गया. लेकिन वह मानते हैं कि इसके बाद ठंडा पड़ा क्रिकेट 2007 में दोबारा जी उठा, जब भारत ने पहला ट्वेन्टी 20 क्रिकेट विश्व कप जीत लिया.

फिर तो क्रिकेट में भारी बदलाव होते गए. लीग मुकाबले शुरू हुए और भारत का आईपीएल दुनिया में सबसे ज्यादा पैसे कमाने वाला क्रिकेट लीग बन गया. कभी पांच दिनों तक चलने वाले मैचों का फैसला सिर्फ तीन घंटे में और 40 ओवर में होने लगा. कायदे से इसे 100 ओवर वाले मैचों से कम राजस्व मिलना चाहिए, लेकिन इसने कमाई के भी नए कीर्तिमान बनाने शुरू कर दिए. दिन भर काम करने के बाद लोग शाम में तीन घंटे आराम से मैच देखने को तैयार होने लगे. यह सब सचिन तेंदुलकर के दौर में हुआ.

करोड़ों करोड़ कमाई

कुछ खिलाड़ियों की कमाई करोड़ो पार अरबों के आस पास पहुंचने लगी. क्रिस गेल जैसे खिलाड़ियों ने अपनी राष्ट्रीय टीमों से खेलने की बजाय भारत के आईपीएल में खेलने का फैसला किया. बूथ का कहना है, “मैं सोचता हूं कि बीसीसीआई विश्व क्रिकेट को लेकर कितना संजीदा है. क्या वे वैश्विक क्रिकेट के बारे में सोच रहा है या फिर सिर्फ भारतीय क्रिकेट के बारे में.”

भारतीय राष्ट्रीय टीम के पूर्व मैनेजर और अब आईपीएल की दिल्ली डेयरडेविल की कमान संभाल रहे अमृत माथुर का मानना है कि खेल में बदलाव तो होते रहने चाहिए लेकिन इसमें तेंदुलकर की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, “यह अद्भुत है कि सिर्फ एक खिलाड़ी के दौर में इतने सारे बदलाव होते चले गए. अभी और पैसा है. अभी और क्रिकेट है. खिलाड़ियों को भी इस बारे में पता है.”

उनका कहना है कि इसकी वजह से क्रिकेट भी बदल रहा है और खिलाड़ी नए शॉट का आविष्कार कर रहे हैं. कोई रिवर्स स्कूप कर रहा है, तो कोई फील्डिंग में नए तरीके अपना रहा है. क्रिकेट अब पहले से ज्यादा प्रतिद्वंद्वी खेल बन गया है.

सचिन ही सचिन

जहां तक सचिन का सवाल है, उन्होंने ट्वेन्टी 20 में शुरू में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. उन्होंने भारत के लिए सिर्फ एक बार 2006 में टी20 मैच खेला. हालांकि बाद में आईपीएल में वह मुंबई इंडियंस के नियमित खिलाड़ी और कप्तान बने. उन्होंने इस साल आईपीएल को अलविदा कहने का फैसला किया. सचिन ने खेल में हुए बदलावों को खूबसूरती से न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि अपने खेल को उसी सांचे में ढालने का भी प्रयास किया.

माथुर का मानना है कि भले ही सचिन ने क्रिकेट को बहुत कुछ दिया लेकिन क्रिकेट ने उन्हें भी लोकप्रियता की बुलंदियों तक पहुंचाया. बड़ी बड़ी कंपनियां अपने विज्ञापन में सचिन का इस्तेमाल करने लगीं. बड़े बड़े होर्डिंग्स पर सचिन के विशालकाय पोस्टर छपने लगा. माथुर कहते हैं, “उन्होंने 1980 के दशक के आखिरी सालों में क्रिकेट शुरू किया, भारतीय क्रिकेट वित्तीय तौर पर बहुत अच्छा नहीं था. लेकिन जैसे जैसे उन्होंने कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ीं, भारत भी क्रिकेट में मजबूत होता गया.”

क्या क्रिकेट आज इतना ही महत्वपूर्ण होता, अगर सचिन का क्रिकेट में अस्तित्व ही नहीं होता? माथुर समझते हैं, “शायद, हां.”

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