नागरिक अधिकारों पर सरकारी चोट

0,,17087488_303,00कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं के पीछे स्टिंग ऑपरेशन ही रहे हैं जिनमें बीजेपी के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का रिश्वत लेना और इस कारण पिछले वर्ष उन्हें चार साल की कैद की सजा होना, बीजेपी नेता दिलीपसिंह जू देव का रिश्वत लेना और राडिया टेप कांड के कारण चल रही जांच जैसी घटनाएं प्रमुख हैं. इन दिनों भी कोबरापोस्ट डॉट कॉम और गुलेल डॉट कॉम पर जारी एक स्टिंग ऑपरेशन के कारण गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की कार्यशैली पर उंगलियां उठ रही हैं.

बीजेपी ने इसे कांग्रेस की साजिश बताया है लेकिन गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री और नरेंद्र मोदी के निकटतम सहयोगी अमित शाह और एक पुलिस अधिकारी के बीच हुई बातचीत के टेप की प्रामाणिकता पर सवालिया निशान नहीं लगाया है. इस बातचीत से पता चलता है कि अमित शाह किन्हीं “साहेब” के निर्देश पर पुलिस द्वारा एक युवती पर चौबीस घंटे निगरानी रखवा रहे थे और इस काम के लिए पुलिस की मशीनरी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा था. माना जा रहा है कि यह “साहेब” नरेंद्र मोदी हैं. उधर उस युवती के पिता ने पत्र लिखकर स्वयं यह माना है कि मोदी ने यह सब उनके अनुरोध पर ही कराया था क्योंकि वह अपनी पुत्री की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे. इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी तक उस युवती का कोई बयान सामने नहीं आया है.

इस स्टिंग ऑपरेशन के पीछे साजिश है या नहीं, इससे आम नागरिक को कोई सरोकार नहीं है. उसका सरोकार तो इस बात से है कि क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी मशीनरी और पुलिस बल का इस्तेमाल किसी व्यक्ति के निजी हित पूरे करने के लिए किया जा सकता है? क्या किसी भी व्यक्ति की निजी जिंदगी पर चौबीस घंटे निगाह रखकर सरकार उसकी व्यक्तिगत आजादी का हनन नहीं कर रही? क्या इस तरह की निगरानी उस व्यक्ति की भी की जा सकती जिस पर न किसी अपराध करने का आरोप हो और जो किसी भी अन्य मामले में संदेह के घेरे में न हो? क्या किसी पिता को अधिकार है कि वह अपनी वयस्क पुत्री की जानकारी के बगैर उसकी हर गतिविधि पर पुलिस की निगरानी करवाए? और क्या किसी मुख्यमंत्री को यह अधिकार है कि वह राज्य के पुलिस एवं प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल अपने किसी परिचित के अनुरोध मात्र पर उसके निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए करे और एक नागरिक की सघन जासूसी करवाए?

अभी तक उस युवती का कोई बयान सामने नहीं आया है. इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वह किससे मिल रही थी, कहां जा रही थी, टेलीफोन पर किससे और क्या बात कर रही थी, इस सबकी जासूसी क्यों कराई गई. केवल सुरक्षा ही यदि एकमात्र सरोकार था तो इस तरह की चौबीस घंटे की निगरानी की जरूरत नहीं थी. इस संदर्भ में हम यह नहीं भूल सकते कि हमारे देश में होने वाली तथाकथित “ऑनर किलिंग” की सभी वारदातें न केवल मां-बाप, भाई और अन्य रिश्तेदारों की मर्जी से होती हैं बल्कि अक्सर उन्हीं के हाथों होती हैं. इन वारदातों के पीछे लड़की का किसी के साथ प्रेम संबंध हो जाना या अपनी इच्छा से किसी के साथ विवाह करना या प्रेम विवाह के लिए घर से भाग जाना प्रमुख कारण होता है और परिवार को लगता है कि उसकी इज्जत पर ऐसा दाग लग गया है जो लड़की और उसके प्रेमी या पति के खून से ही मिटाया जा सकता है.

इस मामले में युवती के पिता प्राणलाल सोनी ने एक पत्र राष्ट्रीय महिला आयोग को भी लिखा है और अनुरोध किया है कि आयोग कोई जांच न करे क्योंकि जो भी कुछ हुआ वह उनकी और उनकी पुत्री की मर्जी से हुआ. हालांकि अभी तक इस पत्र की प्रामाणिकता भी सिद्ध नहीं हुई है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से आयोग ने सोनी के इस अनुरोध को मान लिया है. आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा पहले भी अपने कई विवादास्पद बयानों के कारण खबरों की सुर्खियों में रही हैं. उनके इस निर्णय ने एक बार फिर सबको सकते में डाल दिया है और आयोग की अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के वैचारिक रुझान पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है.

इस पूरे प्रकरण में दो मुद्दे सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं. एक है लोकतन्त्र में राज्य एवं नागरिक का संबंध और दूसरा है बिना किसी लैंगिक भेदभाव के महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार दिया जाना. ये दोनों मुद्दे बुनियादी अधिकारों और स्वतंत्रताओं की परिधि में आते हैं और दर्शाते हैं कि लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं. दुर्भाग्य से इस पूरे प्रकरण से पता चलता है कि आजादी के 67 साल बीत जाने के बाद भी राजसत्ता को निजी सत्ता की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति कम होने के बजाय बढ़ी ही है. 1950 के दशक में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि किसी निर्दोष नागरिक की निजता पर राज्य इतने निरंकुश और अमर्यादित ढंग से प्रहार कर सकता है. जरूरत इस बात की है कि इस प्रकरण को कांग्रेस बनाम बीजेपी की राजनीतिक कुश्ती में न बदलने देकर नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया जाए.from dw.de

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