आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी ) की रिपोर्ट में कहा गया है कि अब तक न्यूजीलैंड वासी उत्कृष्ट गुणवत्ता के पर्यावरण और प्राचीन काल के वनों की तरह के जीवन स्तर का लुत्फ उठाते आए हैं।
ओईसीडी के पर्यावरण निदेशक सिमोन अप्टॉन का कहना है, “हालांकि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर आधारित न्यूजीलैंड के विकास मॉडल के चलते पर्यावरणीय खतरे नजर आने लगे हैं, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन स्तर और जल प्रदूषण बढ़ गया है।”
वैश्विक उत्सर्जन में न्यूजीलैंड की हिस्सेदारी बहुत मामूली है, लेकिन ओईसीडी की तीसरी रिपोर्ट ‘एनवायर्नमेंटल परफॉर्मेस रीव्यू ऑफ न्यूजीलैंड’ में कहा गया है कि अत्यधिक पशुपालन एवं दुग्ध व्यवसाय, सड़क पर बढ़ती वाहनों की भीड़ और उद्योगों के कारण न्यूजीलैंड में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का स्तर 1990 के बाद से 23 फीसदी बढ़ चुका है।
कुल उपभोग का 80 फीसदी बिजली गैर परंपरागत तरीकों से पैदा करने के बावजूद न्यूजीलैंड का सकल घरेलू उत्पाद की प्रति इकाई के अनुपात में उत्सर्जन के आधार पर ओईसीडी समूह के देशों में दूसरा और प्रति व्यक्ति के आधार पर पांचवां स्थान है।
रिपोर्ट के अनुसार, कृषि करने के वैकल्पिक तरीकों को विकसित कर पर्यावरण पर इसके बढ़ते दबाव को कम किया जा सकता है।
दुग्ध व्यवसाय के बेहद तेजी से बढ़ने के कारण मिट्टी, भूजल तथा अन्य जल स्रोतों में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ी है।
यही हाल शहरों में बढ़ती कारों, उनमें भी अधिकतर के पुराने मॉडल का होने तथा अधिक उत्सर्जन करने वाला होने के कारण है।
न्यूजीलैंड के पर्यावरण मंत्री निक स्मिथ ने कहा है कि रिपोर्ट ने न्यूजीलैंड के हरित लक्ष्यों तथा सामने खड़ी चुनौतियों को रेखांकित किया है।
वहीं विपक्षी ग्रीन पार्टी का कहना है कि यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि देश पर्यावरण पर हुए पेरिस समझौते में तय लक्ष्यों से चूक रहा है।
dharmpath.com dharmpath