इस्लामाबाद, 27 नवंबर (आईएएनएस)। इस्लामाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार को सरकार व ईश निंदा विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच मध्यस्थता करने को लेकर पाकिस्तान सेना की कड़ी आलोचना की।
ईश निंदा विरोधी प्रदर्शनकारियों ने 20 दिनों से एक प्रमुख राजमार्ग को रोके रखा व देश के कानून मंत्री के इस्तीफे की मांग करते रहे। इस्तीफे के बाद ही उन्होंने आंदोलन वापस लिया। इस दौरान पुलिस कार्रवाई में छह प्रदर्शनकारी मारे गए।
प्रदर्शनकारी कानून मंत्री द्वारा पैगंबर मोहम्मद के संदर्भ वाले एक संघीय कानून में हाल में हुए संशोधन को लेकर इस्तीफे की मांग कर रहे थे।
समाचार एजेंसी एफे की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार अंतत: सोमवार को पहले जाहिद हामिद के इस्तीफे व गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों की रिहाई के साथ तहरीक-ए-लबैक पार्टी की अगुवाई वाले कट्टरपंथी इस्लामी प्रदर्शनकारियों की मांगों के सामने झुक गई।
समाचार एजेंसी एफे से अदालत के प्रवक्ता अदनान मजीद ने कहा कि न्यायाधीश शौकत अजीज सिद्दीकी ने सुनवाई के दौरान कहा, “मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाली सेना कौन है।”
अदालत में गृहमंत्री एहसान इकबाल को इस्लामिक पार्टी के विरोध से जुड़े घटनाक्रम के स्पष्टीकरण के लिए बुलाया गया था।
समाचार एजेंसी एफे को मिली अदालत के एक आदेश की प्रति के अनुसार, ‘न्यायाधीश ने इस पर हैरत जताई कि समझौते पर एक सेना के अधिकारी मेजर जनल फयाज हमीद व अन्य लोगों ने दस्तखत किए हैं।’
इसी अदालत ने शनिवार को राजमार्ग से प्रदर्शनकारियों की नाकाबंदी को हटाने का आदेश दिया था।
अदालत के आदेश के बाद पाकिस्तान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की। प्रदर्शनकारियों व पुलिस के बीच संघर्ष में छह लोगों की मौत हो गई व सैकड़ों घायल हो गए। लेकिन, पुलिस प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने में नाकाम रही।
इसके बाद सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना की तैनाती का आदेश दिया। हालांकि, सिद्दीकी ने रविवार को पुष्टि की कि सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जवानों को तैनात करने की बजाय मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
न्यायाधीश ने कहा, “सेना को अपनी संवैधानिक कर्तव्यों के भीतर रहने की जरूरत है। यह चकित कर देने वाला है कि सेना देश में कानून तोड़ने वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उदासीन कैसे बनी रही।”
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