तिरुवनंतपुरम, 14 मई (आईएएनएस)। केरल वर्तमान में मृत्युदर और प्रजनन स्तर के नीचे आने से अग्रिम जनसांख्यिकीय परिवर्तन का अनुभव कर रहा है और पलायन भविष्य के जनसांख्यिकीय परिदृश्य को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सोमवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई।
केरल में पलायन और राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए इसके प्रभाव पर ‘इंपैक्ट ऑफ मॉर्टैलिटी एंड फर्टिलिटी ट्रांजीशन’ शीर्षक वाली रिपोर्ट को प्रसिद्ध जनसांख्यिकीय विशेषज्ञ एस. इरुदया राजन के नेतृत्व वाली टीम ने यहां विकास अध्ययन केंद्र में पटल पर रखा।
राजन ने कहा, “1989 में केरल शिशु मृत्युदर (आईएमआर) 25 से नीचे रखने की उपलब्धि हासिल करने वाला पहला भारतीय राज्य था, जबकि 2016 में राज्य की आईएमआर घटकर 10 हो गई। लेकिन 2016 में भारत की आईएमआर 34 रही, जिसे केरल के समान रखने में काफी लंबा रास्ता तय करना है।”
अध्ययन में दिखाया गया कि जन्म के समय जीवन की उम्मीद को बेहतर करने में केरल ने महत्वपूर्ण उन्नति की है।
वर्ष 1951-1960 के दौरान केरल में जन्मे पुरुषों और महिलाओं की जीवन आशा क्रमश: 44.2 साल और 48.1 साल हुआ करती थी जो 2011-2015 के दौरान बढ़कर 72.2 और 78.2 साल हो गई है।
राजन ने कहा, “मृत्युदर के स्तर में महत्वपूर्ण गिरावट के साथ प्रजनन स्तर में भी विशेष रूप से कमी आई है। वर्ष 1987 में प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन क्षमता को हासिल करने वाला पहला भारतीय राज्य केरल था, जबकि भारत 2015-16 के दौरान भी इस जनसांख्यिकीय उपलब्धि को हासिल करने में नाकाम रहा है। केरल की कुल प्रजनन दर (टीएफआर)1.6 हो गई है।”
राज्य में मृत्युदर और प्रजननदर में कमी का संयुक्त प्रभाव जनसंख्या की स्वाभाविक वृद्धिदर में कमी दिखाता है।
हालांकि केरल की आबादी वर्ष 1961 में 1.69 करोड़ थी, जो 2011 में बढ़कर 3.34 करोड़ हो गई। इस संख्या में करीब दोगुना वृद्धि हुई है।
dharmpath.com dharmpath