उस दिन ने मेरी दुनिया उजाड़ दी : प्रत्यक्षदर्शी

काठमांडू, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। मेडिकल इंजीनियर आभास केशी की तरह ही हजारों लोगों ने शनिवार सुबह राजधानी काठमांडू में आए 7.9 तीव्रता वाले जलजले और उसके बाद के मंजर को अपनी आंखों से देखा। आभास ने यहां बेचैन कर देने वाले भूकंप के उन्हीं शुरुआती घंटों का आंखों देखा हाल आईएएनएस से साझा किया :

काठमांडू, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। मेडिकल इंजीनियर आभास केशी की तरह ही हजारों लोगों ने शनिवार सुबह राजधानी काठमांडू में आए 7.9 तीव्रता वाले जलजले और उसके बाद के मंजर को अपनी आंखों से देखा। आभास ने यहां बेचैन कर देने वाले भूकंप के उन्हीं शुरुआती घंटों का आंखों देखा हाल आईएएनएस से साझा किया :

मैं अपने साढ़े तीनमंजिला मकान में बैठा हुआ था। उसी दौरान हमारे बैठक कक्ष में भूकंप का तेज झटका महसूस हुआ और वहां रखा सामान इधर-उधर गिर पड़ा। मेरे परिवार में मेरे दादा-दादी सहित कुल सात सदस्य हैं। हम तुरंत समझ गए कि यह भयंकर भूकंप है। हम सभी बदहवास से दादी-दादी को लेकर घर से बाहर खुली जगह की ओर भागे।

मेरा घर न्यू बनेश्वर में है, जो हवाईअड्डे से करीब तीन किलोमीटर दूर है। घर की बगल में एक खुला मैदान है। हम सभी डरे-सहमे व सलामती की दुआ करते हुए वहां एकत्रित हुए। मैंने देखा कि हमारे घर के परिसर की छह फीट ऊंची दीवार जमींदोज हो गई, जिससे रास्ता बंद हो गया। लोग जान बचाने के लिए अपने घरों से निकल खुली जगहों की ओर दौड़ रहे थे।

मैंने पहली बार महसूस किया कि कंक्रीट की इमारतें तक भूकंप जैसी आवाज पैदा कर सकती हैं। उसके बाद लोगों में चीख-पुकार मचनी शुरू हो गई। खुशकिस्मती से हमारी और हमारे दर्जनभर पड़ोसियों की इमारतें सही-सलामत खड़ी थीं, लेकिन भूतल पर स्थित इमारत के जलशोधन टैंक फट गया। टैंक का फटना एक धमाके जैसा था।

शुरुआती झटका थमने के बाद हमें क्या करना चाहिए, हमने इस पर विचार-विमर्श करना शुरू किया। हम में से कुछ तुरंत कुछ चादरें और खाने-पीने की चीजें लेने के लिए घर के अंदर दौड़े, क्योंकि भूकंप के बाद दोबारा आए जोरदार झटके से हमें स्पष्ट हो गया कि हम इमारत में वापस नहीं आ सकेंगे। मैंने वहां से दो मोटरसाइकिलें निकालीं और उन्हें खुली जगह पर रख दी, ताकि जरूरत पड़ने पर मैं किसी को कच्चे रास्ते से उन पर अस्पताल ले जा सकूं।

शाम में मैंने अपने आसपास की जगहों का मोटा-मोटा जायजा लिया। कन्वेंशन सेंटर में कई हजार लोग जुटे हुए थे। लेकिन उससे आगे टुंडीखेल मैदान में हजारों लोग एकत्रित थे। यह जगह काठमांडू के हाइड पार्क जैसी है। युवा उद्यमियों के एक समूह को एक बहुत बड़ी प्लास्टिक शीट मिली थी, जिसकी मदद से उन्होंने एक तंबू बनाया। इसमें करीब 60-70 लोगों को आश्रय मिल गया।

हल्की बूंदाबांदी की वजह से लोगों को सिर छुपाने के लिए एक जगह मिलनी जरूरी हो गई थी। हर कोई इस बात से वाकिफ था कि उन्हें लंबे समय तक खुले आसमान तले रहना होगा। मैंने वहां कई इमारतें देखीं, जिनमें दरारें पड़ चुकी थीं और कुछेक जमींदोज हो गई थीं।

रात खुले आसमान तले गुजरी। आंखों से नींद गायब थी। ना कोई ट्रैफिक का शोर और ना कोई चहल-पहल। वह मंजर ऐसा था, मानो वक्त ठहर गया हो।

हमें पूरे दिन में बहुत थोड़ा सा खाना मिला और जो पानी मिला, उसे हमने बचाकर रख लिया।

अगली सुबह मैं तड़के-तड़के अपनी मोटरसाइकिल पर अपने अस्पताल के लिए निकल गया। मैं सड़कों और रास्ते में आने वाली इमारतों में कई दरारें देख सकता था।

मैं कांतिपुर अस्पताल में घायलों की सेवा में जुटे लोगों को देखकर अभिभूत था। यह 100 बिस्तर वाला अस्पताल है, लेकिन इसमें पहले से ही क्षमता से 50 से अधिक लोग उपचाराधीन थे। मुझे अधिकांश घायलों के बारे में अपने सहकर्मियों से जानने को मिला। उनमें से अधिकांश की चोटें हड्डियों से संबंधित थीं। भूकंप आने के तुरंत बाद से रेजीडेंट डॉक्टर व नर्से बिना रुके काम कर रहे हैं।

अपराह्न् में, मैं 500 से अधिक बिस्तर वाले सरकारी सिविल अस्पताल का जायजा लेने गया। भूकंप में अस्पताल का मुख्य दरवाजा गिर गया, जिसमें तीन लोग मारे गए।

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