वाशिंगटन, 24 मई (आईएएनएस)। अमेरिकी कांग्रेस के उच्च सदन सीनेट में फोन टैपिंग रोकने संबंधी विधेयक पारित नहीं हो सका। सीनेट में इसके पक्ष में केवल 57 वोट पड़े, जबकि इसके लिए 60 मतों की आवश्यकता थी। यह विधेयक अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) को आम लोगों के फोन टैप करने से रोकता है।
इस विधेयक का पारित न हो पाना ओबामा प्रशासन के लिए झटका माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आम लोगों के फोन टैप करने को उनकी स्वतंत्रता के अधिकार का हनन बताकर इसका विरोध करते रहे हैं।
यूएसए फ्रीडम एक्ट नामक इस विधेयक में एनएसए को आम लोगों का फोन टैप करने से रोकने का प्रावधान है। हालांकि यह विधेयक सुरक्षा एजेंसी को टेलीफोन कंपनियों द्वारा संकलित कॉल रिकॉर्ड खंगालने का अधिकार देता है। सीनेट से इसे पारित कराने के लिए 60 वोटों की आवश्यकता थी, लेकिन इसके पक्ष में केवल 57 वोट पड़े और तीन वोट कम रह जाने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका।
ओबामा समर्थित यह विधेयक हालांकि प्रतिनिधि सभा से इस महीने के प्रारंभ में ही पारित हो गया था। प्रतिनिधि सभा में इसके पक्ष में 338 वोट पड़े थे, जबकि विरोध में केवल 88 वोट पड़े थे।
इस बीच, सीनेट ने पैट्रियट एक्ट की वैधता की अवधि बढ़ाने से संबंधित विधेयक को भी नामंजूर कर दिया, जो एनएसए को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोगों की जासूसी करने और उनके फोन टैप करने का अधिकार देता है। इसकी अवधि पहली जून को समाप्त हो रही है।
ऐसे में प्रशासन के लिए अजीब संकट की स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें न तो पुराने कानून को विस्तार देने वाला विधेयक पारित हो पाया और न ही उसकी जगह पर नए विधेयक को मंजूरी मिल पाई।
सीनेट की बैठक एक बार फिर 31 मई को होने वाली है, जिसमें पैट्रियट एक्ट की वैधता की अवधि बढ़ाने से संबंधित विधेयक को एक बार फिर पारित कराने की कोशिश की जाएगी। लेकिन यहां एक और अनिश्चिता इसके प्रतिनिधि सभा से पारित होने को लेकर है, जहां जून तक मध्यावकाश है, उक्त विधेयक की मियाद भी उसी तारीख को समाप्त हो रही है।
गौरतलब है कि अमेरिका में एनएसए द्वारा आम लोगों के फोन टैप करने का खुलासा पूर्व खुफिया अधिकारी एडवर्ड स्नोडेन ने किया था। एनएसए ने फोन टैपिंग का काम अमेरिका पर 11 सितंबर, 2001 को हुए आतंकवादी हमले के बाद शुरू किया था। लेकिन एनएसए ने उन लाखों लोगों का भी फोन टैप करना शुरू कर दिया, जिनका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं होता या जो संदिग्धों की श्रेणी में नहीं आते। इसका खुलासा होने पर अमेरिका को दुनियाभर में फजीहत झेलनी पड़ी। स्वयं अमेरिका में कार्यकर्ताओं ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया।
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