सिंगापुर, 23 नवंबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कहा कि एशिया के सतत विकास के लिए भारत अब उज्जवल आशा का केंद्र बन चुका है। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ एक वैश्विक मोर्चे की मांग की।
मोदी ने 37वें सिंगापुर व्याख्यान में कहा, “एशिया का पुनरुत्थान हमारे युग की एक सबसे बड़ी घटना है। बीती सदी के मध्य के अंधेरे से जापान के नेतृत्व में एशिया का उत्थान हुआ। इसके बाद इसका विस्तार दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण कोरिया व चीन तक हुआ।”
मोदी ने कहा, “और अब भारत एशिया की गतिशीलता व समृद्धि के लिए एक उज्जवल आशा का केंद्र बन चुका है।”
सिंगापुर के साथ भारत के संबंधों की चर्चा करते हुए मोदी ने कहा, “सिंगापुर से हमने कई चीजें सीखी हैं। देश का आकार उसकी उपलब्धियों के आड़े नहीं आता।”
उन्होंने कहा, “और संसाधनों की कमी प्रेरणा, कल्पनाशीलता व नवोन्मेष में बाधा नहीं बनती।”
सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली शेन लूंग के साथ मोदी ने भारत व सिंगापुर के संबंधों की महत्ता को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा, “जब से भारत ने दुनिया के लिए अपने द्वार खोले हैं, सिंगापुर भारत के लिए पूरब का द्वार बन गया है।”
मोदी ने कहा, “आज की तारीख में सिंगापुर दुनिया में हमारा सबसे महत्वपूर्ण साझेदार है। यह ऐसा संबंध है, जो जितना रणनीतिक है, उतना ही विस्तृत।”
अपने स्वच्छ भारत अभियान के बारे में मोदी ने कहा कि इसका उद्देश्य भारतीयों के सोचने, रहने व कार्यो में परिवर्तन का है।
उन्होंने कहा, “अपने कानूनों, नियमों, नीतियों, प्रक्रियाओं व संस्थानों में सुधार कर हम अवसरों का सृजन कर रहे हैं।”
प्रधानमंत्री ने दुनिया से आतंकवाद का एक सुर में विरोध की अपील की।
उन्होंने कहा, “दुनिया को आतंकवाद के खिलाफ एक सुर में आवाज उठाना चाहिए और समर्थन व्यक्त करना चाहिए।”
मोदी ने कहा, “आतंकवाद से केवल लोगों की जानें नहीं जाती, बल्कि यह अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने का भी काम करता है।”
उन्होंने कहा, “आतंकवाद एक वैश्विक चुनौती है और अलग-अलग समूह की तुलना में एक बड़ा बल है।”
प्रधानमंत्री ने कहा, “दुनिया को एक सुर में बोलना चाहिए और एकमत से इसके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। इसके खात्मे के लिए राजनीतिक, कानूनी, सैन्य व खुफिया प्रयास होने चाहिए। हमें और काम करने की जरूरत है।”
उन्होंने कहा, “दुनिया के देशों को एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए।”
मोदी ने कहा कि एशिया असाधारण प्रतिभाओं का क्षेत्र रहा है। लेकिन हम जानते हैं कि स्थायी तौर पर शांति व समृद्धि अपरिहार्य नहीं है।
उन्होंने कहा, “एशिया के पास उसकी प्राचीन संस्कृतियों का ज्ञान है।”
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