जिस व्रत से मिलता है मनचाहा जीवनसाथी

shivlingamआषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि से कोकिला व्रत आरंभ होता है जो श्रावण पूर्णिमा को समाप्त होता है। इस वर्ष यह व्रत 22 जुलाई से शुरू हो रहा है और 20 अगस्त को समाप्त होगा। यह व्रत इस बात को दर्शाता है कि सजा सिर्फ इंसानों को ही नहीं देवी-देवताओं को भी मिलती है।

शास्त्रों के अनुसार यह व्रत पहली बार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए किया था। पार्वती रूप में जन्म लेने से पहले पार्वती कोयल बनकर दस हजार सालों तक नंदन वन में भटकती रही। शाप मुक्त होने के बाद पार्वती ने कोयल की पूजा की इससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और पत्नी के रूप में पार्वती को स्वीकार किया।

शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से हुआ था। प्रजापति शिव को पसंद नहीं करता था यह जानते हुए भी सती ने शिव से विवाह कर लिया। इससे प्रजापति सती से नाराज हो गया।

एक बार प्रजापति ने बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवी-देवताओं को बुलाया लेकिन शिव और सती को न्योता नहीं भेजा। सती के मन में पिता के यज्ञ को देखने की इच्छा हुई और वह शिव से हठ करके दक्ष के यज्ञ स्थल पर पहुंच गयी।

इससे दक्ष ने शिव और सती का बहुत अपमान किया। सती अपमान सहन नहीं कर सकी और यज्ञ कुण्ड में कूद कर जल गयी। इसके बाद शिव ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और हठ करके प्रजपति के यज्ञ में शामिल होने के कारण सती को श्राप दिया कि वह दस हजार सालों तक कोयल बनकर नंदन बन में रहे।

कोकिला व्रत के विषय में मान्यता है कि इससे सुयोग्य पति की प्राप्ति होती है। विवाहित स्त्रियां इस व्रत का पालन करती हैं तो उनके पति की आयु बढ़ती है। घर में वैभव और सुख की वृद्धि होती है। इस व्रत को सौन्दर्य प्रदान करने वाला व्रत भी माना जाता है क्योकि इस व्रत में जड़ी-बूटियों से स्नान का नियम है।

कोकिला व्रत रखने वाली स्त्रियों के लिए नियम है कि पहले आठ दिन तक आंवले का लेप लगाकर स्नान करे। इसके बाद आठ दिनों तक दस औषधियों कूट, जटमासी, कच्ची और सूखी हल्दी, मुरा, शिलाजित, चंदन, वच, चम्पक एवं नागरमोथा पानी में मिलाकर स्नान करने का विधान है।

इसके अगले आठ दिनों तक पिसी हुई वच को जल में मिलाकर स्नान करें और अंतिम छह दिनों में तिल, आंवला और सर्वऔषधि से स्नान करना चाहिए। प्रत्येक दिन स्नान के बाद कोयल की पूजा करें और अंतिम दिन कोयल को सजाकर उसकी पूजा करें। पूजा करने के बाद ब्राह्मण अथवा सास-श्वसुर को कोयल दान कर दें।

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