बीजिंग, 28 जून (आईएएनएस)। चीन के एक समाचार पत्र ने मंगलवार को भारत से कहा कि परमाणु आपूर्तिकर्ता (एनएसजी) समूह में प्रवेश करने में विफल रहने पर वह चिड़चिड़ेपन का इजहार न करे। अखबार ने यह भी कहा कि ‘पश्चिमी देशों की प्रशंसा ने भारत को अंतर्राष्ट्रीय मामले में थोड़ा दंभी बना दिया है।’
द ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक तल्ख संपादकीय में कहा कि गत सप्ताह सियोल में एनएसजी में भारत के प्रवेश का विरोध केवल चीन ने नहीं, बल्कि कम से कम दस देशों ने किया था।
अखबार ने लिखा कि परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत किए बिना भारत एनएसजी की सदस्यता लेने वाला पहला अपवाद बनना चाहता था, लेकिन चीन और अन्य देश इससे सहमत नहीं हुए।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के विचारों को व्यक्त करने वाले अखबार के रूप में मशहूर द ग्लोबल टाइम्स ने कहा, “लेकिन, भारतीय लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।”
संपादकीय नें कहा गया है, “अमेरिकी समर्थन से भारत की आकांक्षा में पंख लग गए हैं। भारत को गले लगाने की वाशिंगटन की नीति का मकसद दरअसल चीन को रोकना है।”
दैनिक ने कहा, “अमेरिका संपूर्ण विश्व नहीं है। अमेरिकी समर्थन का मतलब यह नहीं है कि भारत ने पूरी दुनिया का समर्थन हासिल कर लिया है। भारत ने इस मूल तथ्य की अनदेखी की है।”
संपादकीय में लिखा गया है कि भारत के कुछ दोषारोपण का तो कोई अर्थ ही नहीं है। भारत की प्रतिक्रिया से ऐसा प्रतीत हुआ कि उसे लगता है कि उसका राष्ट्रीय हित मान्यताप्राप्त वैश्विक सिद्धान्तों की अवहेलना कर सकता है।
अखबार का मानना है कि हाल के वर्षो में पश्चिमी दुनिया ने भारत को खूब शाबाशी दी है, जबकि चीन को नीचा दिखाया है। इससे भारत बिगड़ गया है।
संपादकीय में कहा गया है कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद चीन की तुलना में केवल 20 प्रतिशत है, लेकिन फिर भी वह पश्चिम की आंखों का तारा बना हुआ है और चीन की तुलना में उसे प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिली हुई है।
द ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि कुछ भारतीय आत्मकेंद्रित और आत्म संतुष्ट हैं, जबकि इसके विपरीत भारत सरकार शालीन व्यवहार करती है और बातचीत के लिए इच्छुक है। झल्लाहट का इजहार भारत के लिए विकल्प नहीं हो सकता।
अखबार ने लिखा कि सोमवार को प्रक्षेपास्त्र प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) ने भारत को नए सदस्य के रूप में संगठन में शामिल कर लिया और चीन को सदस्य बनाने से इनकार कर दिया। इस खबर से चीन नागरिकों के बीच एक लहर तक नहीं उठी। चीनी नागरिक अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में मिलने वाले इन झटकों से निपटने के लिए अधिक परिपक्व हो गए हैं।
संपादकीय में नसीहत देते हुए कहा गया कि भारतीय राष्ट्रवादियों को सीखना चाहिए कि खुद कैसा व्यवहार करना है। अगर वे कामना करते हैं कि उनका देश एक महाशक्ति बने तो उन्हें जानना चाहिए कि महाशक्तियां कैसे अपना खेल खेलती हैं।
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