रांची, 13 मई (आईएएनएस)। झारखंड के विपक्षी दलों समेत सभी जनजातीय और मूलनिवासी संगठनों ने राज्य की भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार की अधिवास नीति के विरोध में शनिवार को एक दिन की हड़ताल की घोषणा की है।
इस बंद का आह्वान मुख्य विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने किया है। कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भी इसका समर्थन किया है।
झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के बाबूलाल मरांडी ने भी इस बंद का समर्थन किया है।
यहां तक सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भी इस मुद्दे पर दरार देखी गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने इस नीति का विरोध किया है।
जेएमएम के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने आईएएनएस को बताया, “यहां पूरी तरह से बंद रहेगा। हम शांतिपूर्वक प्रदर्शन करेंगे। राज्य सरकार लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। इस बंद का आयोजन आदिवासी और मूलनिवासी लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए किया जा रहा है।”
बंद के दौरान किसी अप्रिय स्थिति या हिंसा से निपटने के लिए कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। राज्य पुलिस वॉटर कैनन और रबर की बुलेट के साथ मुस्तैद है, ताकि प्रदर्शनकारियों से निपटा जा सके।
कई नेताओं को अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 107 के तहत नोटिस जारी कर पूछा गया है कि शांति बनाए रखने के लिए उन्हें एक बांड भरने का आदेश क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?
साथ ही सीआरपीसी की धारा 144 के तहत दंडाधिकारी को एक साथ 10 लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाने का अधिकार दिया गया है।
बंद के मद्देनजर कुछ कॉलेजों में शनिवार को होने वाली परीक्षा को स्थगित कर दिया गया है।
भाजपा और ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने अप्रैल में अधिवास नीति को अधिसूचित किया था।
इस नीति के अनुसार राज्य में 30 सालों से रहने वाले और अचल संपत्ति के मालिकों को झारखंड का निवासी माना जाएगा।
इसके अलावा राज्य के सीमा पर जो लोग रहते हैं, अगर उनका या उनके परिवार की पिछली पीढ़ी में से किसी का नाम झारखंड के भूअभिलेख में दर्ज है और वे भूमिहीन हैं, लेकिन स्थानीय भाषा बोल सकते हैं और ग्राम सभा उन्हें स्थानीय निवासी के रूप में चिन्हित करती है तो उन्हें भी झारखंड का निवासी माना जाएगा।
नीति के अनुसार अगर कोई झारखंड सरकार, केंद्र सरकार, बोर्ड, कारपोरेशन का कर्मचारी है तो उसे राज्य का निवासी माना जाएगा। इसके अलावा अगर कोई झारखंड में पैदा हुआ है और उसने दसवीं की परीक्षा राज्य से ही पास की है, तो उसे भी राज्य का निवासी माना जाएगा।
नीति के आलोचकों ने अचल संपत्ति और दसवीं की परीक्षा के मानदंडों पर गहरी आपत्ति दर्ज कराई है।
भाजपा ने अर्जुन मुंडा का कहना है, “अगर किसी ने गैरकानूनी रूप से 30 साल पहले से जमीन पर कब्जा जमा रखा हो तो? उन्हें स्थानीय निवासी होने का लाभ देने से अदिवासियों और मूलनिवासियों के हितों को चोट पहुंचेगी।”
दूसरे पूर्व मुख्यमंत्रियों हेमंत सोरेन (जेएमएम), बाबूलाल मरांडी (जेवीएम-पी) और मधु कोड़ा ने भी अधिवास नीति का विरोध किया है।
झारखंड की आबादी में 27 फीसदी आदिवासी हैं। 14 फीसदी महतो हैं जिन्हें मूलनिवासी माना जाता है।
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