न्यूयार्क, 17 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व में किए गए एक ताजा अध्ययन में उस रहस्य को ढूंढ निकाला है कि मानव मस्तिष्क जानकारियों के अकूत भंडार को कैसे सहेजता है।
जॉर्जिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि कैसे मानव मस्तिष्क जानकारियों के समूह में महत्वपूर्ण जानकारी का वर्गीकरण करता है।
वैज्ञानिकों ने मानव के सीखने की प्रक्रिया को समझने के लिए एल्गोरिथम खोज निकाला है। इस विधि का उपयोग मशीन लर्निग, आंकड़ों को विश्लेषण और कंप्यूटर दूरदर्शिता में किया जा सकता है।
संतोष वेंपला के अनुसार, “इस शोध के दौरान यह जानने की कोशिश की गई है कि हम कैसे अपने आस-पास की अलग-अलग जानकारियों को शीघ्र और मजबूती के साथ समझ लेते हैं।”
संतोष कहते हैं कि बुनियादी स्तर पर मानव ने यह सब कैसे करना शुरू किया? इसे समझना एक जटिल समस्या है।
वेंपाला और उनके सहयोगियों ने इस परीक्षण के लिए कुछ प्रतिभागियों से पूछे गए प्रश्नों के दौरान प्रश्नों से संबंधित दो तस्वीरें उन्हें दिखाईं, जिसमें से एक तस्वीर स्पष्ट और दूसरी अमूर्त थी। उसके बाद उनसे प्रश्न से संबंधित तस्वीर को सही-सही पहचानने के लिए कहा गया।
उन्होंने कहा, “हमारी कल्पना थी कि ‘रैंडम प्रोजेक्शन’ की सहायता से हम मानव मस्तिष्क की सूचनाओं को समझने की प्रक्रिया को जान सकते हैं। और हमारी कल्पना सही साबित हुई और इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि मानवों के लिए कुल जानकारी का मात्र 0.15 प्रतिशत हिस्सा भी काफी होता है।”
अगले चरण में वैज्ञानिकों ने कंप्यूटेशनल एल्गोरिथम की जांच मशीनों पर भी की। मशीनों ने मानवों के अनुरूप ही अच्छा प्रदर्शन किया।
वैज्ञानिक बताते हैं, “हमें इस बात का सबूत मिला है कि मानवों और मशीनों का तंत्रिका नेटवर्क समान व्यवहार करता है।”
यह मानवों के साथ ‘रैंडम प्रोजेक्शन’ का पहला अध्ययन माना जा रहा है और यही इस अध्ययन की खास बात है।
वेंपाला का कहना था, “हम मानवों और मशीनों के तंत्रिका तंत्र के बीच इतनी समानता देखकर हैरान रह गए।”
यह अध्ययन शोध पत्रिका ‘न्यूरल कंप्यूटेशन’ (एमआईटी) के आगामी अंक में प्रकाशित किया जाएगा।
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