आरक्षण समर्थकों ने कहा कि उप्र में दलित अधिकारियों, कर्मचारियों की हो रही पदावनति से दलितों में रोष है। दलितों को उस गुनाह की सजा दी जा रही है, जो उन्होंने किया ही नहीं।
आरक्षण समर्थकों की दलील है कि सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण अधिनियम धारा-3(7) को समाप्त कर दिया, जिसमें प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था थी। न्यायालय ने कहा कि प्रोन्नति में आरक्षण के नियम बनाने से पहले एम. नागराज के मामले में दिए गए निर्देशों के अनुसार, दलितों के प्रतिनिधित्व की स्थिति, उनके पिछड़ेपन तथा प्रशासनिक दक्षता पर पड़ने वाले प्रभाव के आंकड़े एकत्र किए बिना प्रोन्नति में आरक्षण के नियम बना दिए गए। इसलिए इस नियम की धारा-3(7) को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार दिया।
आरक्षण समर्थकों ने कहा कि प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 16(4ए) में मौजूद है, जिसे एम. नागराज के मामले में आए निर्देशों के आलोक में लागू किया जा सकता है। बिहार, उत्तरांचल, हरियाणा आदि प्रदेशों में एम. नागराज मामले में आए निर्देशों के अनुसार कमेटी का गठन कर आंकड़े एकत्र किए गए और नए सिरे से प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था लागू की।
आरक्षण समर्थकों ने कहा कि उनकी मांग है कि आंकड़े एकत्र करने के लिए तत्काल एक कमेटी का गठन किया जाए और उसकी रिपोर्ट के आधार पर पदावनत कार्मिकों को प्रतिनिधित्व एवं अन्य शर्ते पूर्ण होने की स्थिति में उन्हें पुन: प्रोन्नत पदों पर पदस्थापित किया जाए।
आंदोलन के प्रथम चरण में उप्र के समस्त जनपदों में 24 सितंबर को जनपद मुख्यालयों पर धरना देकर जिलाधिकारी को ज्ञापन दिया जाएगा। लखनऊ में यह धरना लक्ष्मण मेला मैदान में आयोजित किया गया है। द्वितीय चरण में समस्त जनपदों एवं राज्य मुख्यालयों में सम्मेलन का आयोजन होगा। तृतीय चरण में उप्र की राजधानी में रैली आयोजित की जाएगी तथा अंतिम चरण में संसद के सत्र के दौरान जंतर-मंतर पर पांच लाख दलित प्रदर्शन करेंगे।
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