आस्था नहीं तो दिवस मनाने से नहीं बचेगा पर्यावरण : राजेंद्र सिंह (विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून पर विशेष)

नई दिल्ली, 4 जून (आईएएनएस)। पर्यावरणविद, जल कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह का मानना है कि यदि लोगों के भीतर पर्यावरण के प्रति आस्था नहीं है तो एक दिन के लिए पर्यावरण दिवस मना लेने का कोई अर्थ नहीं है, और इससे कुछ बदलाव नहीं होने वाला है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण की स्थिति विनाश की ओर बढ़ चली है और जन-जन के भीतर आस्था जगाए बगैर इस विनाश को रोक पाना कठिन है।

नई दिल्ली, 4 जून (आईएएनएस)। पर्यावरणविद, जल कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह का मानना है कि यदि लोगों के भीतर पर्यावरण के प्रति आस्था नहीं है तो एक दिन के लिए पर्यावरण दिवस मना लेने का कोई अर्थ नहीं है, और इससे कुछ बदलाव नहीं होने वाला है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण की स्थिति विनाश की ओर बढ़ चली है और जन-जन के भीतर आस्था जगाए बगैर इस विनाश को रोक पाना कठिन है।

राजस्थान के अलवर जिले में मरी हुई अरवरी नदी को जिंदा करने के अपने भगीरथ प्रयास के लिए मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त कर चुके राजेंद्र ने विश्व पर्यावरण दिवस के पूर्व मौके पर आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में कहा, “कोई भी दिवस मनाने का उद्देश्य उस दिवस के निहितार्थ की तरफ लोगों को, उनके ध्यान को आकर्षित करना होता है। पर्यावरण दिवस पर्यावरण के संकट की तरफ लोगों का ध्यान खींचने और इस संकट के बारे में लोगों को याद दिलाने के लिए मनाया जाता है। लेकिन यह अब एक औपचारिकता बनकर रह गया है।”

उल्लेखनीय है कि देश के विभिन्न हिस्सों में तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है। पारा 45 से 50 डिग्री के बीच ऊपर-नीचे हो रहा है। जनजीवन भीषण गर्मी से बेहाल है, देश के कई हिस्सों में गंभीर पेयजल संकट पैदा हो गया है। सूखे पर निगरानी रखने वाली संस्था, सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली (डीईडब्ल्यूएस) ने अपने ताजा अपडेट में देश के लगभग 42.61 फीसदी हिस्से को ‘असामान्य रूप से सूखे’ की चपेट में बताया है।

ऐसे में सवाल उठता है कि पर्यावरण के इस भीषण संकट के बीच पर्यावरण दिवस कितना प्रासंगिक रह गया है?

राजेंद्र कहते हैं, “पर्यावरण का संकट कोई मामूली संकट नहीं, बल्कि यह जीवन का संकट है, और यह संकट इसलिए पैदा हुआ है, क्योंकि पर्यावरण के प्रति राज, समाज की आस्था खत्म हो गई है। आस्था तो दूर, प्रेम भी नहीं रह गया है। यह संकट हमने खुद से पैदा किया है। जब तक यह आस्था फिर से पैदा नहीं हो जाती, पर्यावरण का संकट दूर नहीं होगा। यदि आस्था होती तो पर्यावरण दिवस मनाने की जरूरत नहीं पड़ती।”

उन्होंने कहा, “धरती, पानी, अग्नि, आसमान और हवा मिलकर हमारे पर्यावरण का निर्माण करते हैं, और इन्हीं पंच महाभूतों से हमारे शरीर का भी निर्माण होता है। आज पंच महाभूत संकट में हैं। पर्यावरण संकट में है, जीवन संकट में है। और यह संकट हमने खुद से पैदा किया है। इसका एक मात्र उपाय है इन पंच महाभूतों के प्रति फिर से अपने भीतर आस्था पैदा करना। वरना विनाश दस्तक दे रहा है।”

सवाल उठता है कि यह आस्था पैदा कैसे होगी। लोग समस्या को स्वीकरते तो हैं, समाधान भी करना चाहते हैं, तरह-तरह के प्रयास भी हो रहे हैं। फिर भी समस्या बढ़ती जा रही है, क्यों?

पानी और पर्यावरण पर काम के लिए स्टॉकहोम वाटरप्राइस प्राप्त कर चुके जल पुरुष राजेंद्र ने कहा, “मैं फिर आस्था की बात करूंगा। दरअसल, आस्था खत्म हो जाने के कारण प्रयास उस स्तर का नहीं हो पा रहा है, जितना होना चाहिए। राज, समाज के भीतर का अहसास ही खत्म हो गया है। वे समस्या को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। लोग हाथ-पांव पीट तो रहे हैं, लेकिन उसे जीवन में नहीं उतार पा रहे हैं। कोशिशें कारगर नहीं हो पा रही हैं। इसके लिए सनातन दृष्टि चाहिए। सिर्फ भारत के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए- नित्य, नूतन, निर्माण।”

पर्यावरण में गिरावट जारी है, तो क्या मान लिया जाए कि अब विनाश के बाद प्रकृति ही खुद का पुनर्निर्माण करेगी, या सुधार की संभावना कहीं बची हुई है?

राजेंद्र सिंह ने कहा, “अब तो विनाश की तरफ ही बढ़ रहे हैं। सुधार की संभावना न के बराबर दिखाई देती है। लेकिन कोशिशें होती रहनी चाहिए, क्योंकि ये कोशिशें ही पुनर्निर्माण के बीज बनेंगी, और प्रकृति इन्हीं बीजों से एक बेहतर दुनिया का सृजन करेगी।”

इस संकट के बीच सरकार और समाज की क्या भूमिका होनी चाहिए। आखिर लोगों को क्या करना चाहिए? उन्होंने कहा, “मौजूदा सरकार का नारा है- हर घर को नल देंगे। लेकिन सरकार उन नलों में पानी कहां से लाएगी? इस तरफ उसका ध्यान नहीं है। वह पानी के स्रोत पर काम नहीं कर रही है, नल पर काम कर रही है। यानी वह पर्यावरण के लिए नहीं, जीवन के लिए नहीं, नल बनाने वाली कंपनियों के लिए काम कर रही है। नेताओं की आंखों में पानी नहीं रह गया है, फिर नलों में पानी कहां से आएगा?”

राजेंद्र ने आगे कहा, “कश्मीर से कन्या कुमारी तक पानी की व्यवस्था ताल, पाल, झाल पर निर्भर थी। आज इस जल व्यवस्था पर तथाकथित विकास का अतिक्रमण हो गया है। मन-मस्तिष्क, सरकार, समाज, पर्यावरण सबकुछ प्रदूषित हो गया है। भारत बेपानी होता जा रहा है।”

उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए 1972 में पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में घोषित किया था। इस साल के पर्यावरण दिवस का थीम ‘बीट एयर पॉल्यूशन’ (वायु प्रदूषण को पछाड़ो) है और मेजबान देश चीन है।

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