नई दिल्ली-इंदौर में जल प्रदूषण के कारण 30 से अधिक लोगों की मौत की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने पाया है कि इस त्रासदी को रोका जा सकता था. आयोग के अनुसार, यह घटना संस्थागत विफलता, व्यवस्थागत खामियों और पुरानी पड़ चुकी आधारभूत संरचना को बदलने में हुई देरी का नतीजा थी. पिछले साल देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पानी पीने से कई लोगों की जान चली गई थी.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, रिपोर्ट में कहा गया है, ‘आयोग इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि भागीरथपुरा दूषित जल घटना किसी एक लापरवाही का नतीजा नहीं थी, बल्कि कई दशकों के दौरान अलग-अलग स्तर में हुई विफलताओं का मिलाजुला परिणाम थी.’मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज सुशील कुमार गुप्ता के एक-सदस्यीय आयोग द्वारा 18 अगस्त को सौंपी गई रिपोर्ट में अस्पताल के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए इस त्रासदी से केवल 22 मौतों को जोड़ा गया है. ऑडिट समिति ने पाया था कि 23 में से 16 मौतें दूषित जल से फैली महामारी के कारण हुई थीं. सात मौतों के संबंध में भी अनिश्चितता के तत्व मौजूद थे.
रिपोर्ट में क्षतिग्रस्त जल पाइपलाइन को बदलने के लिए शुरू की गई निविदा प्रक्रिया में 72 दिनों की देरी को प्रमुखता से उल्लेख किया गया है. यह देरी 15 अक्टूबर से 26 दिसंबर 2025 के बीच हुई थी, यानी त्रासदी होने से कुछ ही दिन पहले तक.रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यह पूरी निविदा प्रक्रिया में हुई प्रमुख और असामान्य देरी थी. एक बार जब अतिरिक्त आयुक्त ने ‘Discuss’ (चर्चा करें) दर्ज कर दिया था, तो अपेक्षा थी कि स्पष्टीकरण तुरंत तैयार किए जाते, आपत्तियों का समाधान किया जाता और फाइल को बिना अनावश्यक देरी के दोबारा प्रस्तुत किया जाता. इसके बजाय, फाइल लगभग 72 दिनों तक लंबित रही.’
आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय इंदौर नगर निगम (आईएमसी) के एडिशनल कमिश्नर (जल आपूर्ति) रोहित सिसोनिया और तत्कालीन एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (जल आपूर्ति) संजीव श्रीवास्तव कई देरी के लिए ‘मुख्य रूप से जिम्मेदार’ थे.
रिपोर्ट ने इंदौर नगर निगम (आईएमसी) और इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) को रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में विफल रहने के लिए भी कड़ी आलोचना की है. इनमें निरीक्षण रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज शामिल हैं.रिपोर्ट में कहा गया है, ‘2010 में रिकॉर्ड नष्ट करने के बारे में दी गई सफाई के समर्थन में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है. यह स्थापित करने के लिए कोई नोटशीट, रिकॉर्ड नष्ट करने का रजिस्टर या स्वीकृति संबंधी रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया है कि लापता रिकॉर्ड को कानूनी रूप से नष्ट किया गया था.’
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि त्रासदी के दौरान मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) द्वारा लिए गए 52 पानी के नमूनों में से 50 में टोटल कोलीफॉर्म और 40 में ई. कोली पाया गया. इससे पानी के बैक्टीरिया प्रदूषण की पुष्टि हुई.
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘दूषित होने का तात्कालिक कारण पीने के पानी की सप्लाई सिस्टम में सीवेज का मिलना था, जबकि इसकी मूल वजह सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग और उसे ठीक से लागू न करना था.’
भागीरथपुरा में उल्टी और दस्त का प्रकोप पिछले साल 29 दिसंबर को शुरू हुआ था. इस घटना में लोगों की मौत हुई, जबकि 400 से अधिक मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया था. इस त्रासदी को लेकर विपक्ष ने मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की कड़ी आलोचना की थी.
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