इशरत जहां मामला : एक पुलिस मुठभेड़ का फ्लैशबैक

नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। इशरत जहां मुठभेड़ मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति में हलचल मचा रहा है। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध रह चुके पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली की गवाही ने यह हलचल पैदा की है।

नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। इशरत जहां मुठभेड़ मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति में हलचल मचा रहा है। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध रह चुके पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली की गवाही ने यह हलचल पैदा की है।

अमेरिकी जेल में बंद हेडली ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मुंबई की अदालत में दी जा रही अपनी गवाही में कहा है कि इशरत लश्कर-ए-तैयबा की सदस्य थी।

यह विवाद 15 जून 2004 का है। डीआईजी डी.जी.वंजारा के नेतृत्व वाले पुलिस दल की कार्रवाई की सत्यता पर दावों-प्रतिदावों की झड़ियां लग गई थीं।

कम से कम दो ऐसी जांच हैं जो बताती हैं कि इशरत आतंकी नहीं थी। उसे फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। उसे नृशंस तरीके से मारा गया था।

जब यह मुठभेड़ हुई थी, उस वक्त भाजपा के आज के अध्यक्ष अमित शाह गुजरात के गृह मंत्री थे। जांच के नतीजे सामने आने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। कुछ महीने वह जेल में भी रहे थे। उन्हें जमानत मिली थी, लेकिन अदालत ने उनसे गुजरात से बाहर रहने के लिए कहा था।

इशरत 19 साल की छात्रा थी। उसे प्राणेश पिल्लई उर्फ जावेद गुलाम शेख, अमजद अली राना और जीशान जौहर के साथ कथित फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था।

अहमदाबाद पुलिस ने कहा था कि ये चारों लश्कर के आत्मघाती हमलावर थे। इनका लक्ष्य तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या था। पुलिस का कहना था कि ये संदिग्ध आतंकी 2002 के गुजरात दंगों का बदला लेना चाह रहे थे जिसमें सैकड़ों मुसलमानों की हत्या हुई थी।

घटना के कई महीने बाद 7 सितंबर 2009 को महानगर दंडाधिकारी एस.पी. तमांग ने अहमदाबाद की एक अदालत को अपनी रपट सौंपी। इसमें कहा गया कि इन चारों को गिरफ्तार कर पुलिस हिरासत में मारा गया था। तमांग ने पुलिस के दावों को फारेंसिक रपट के हवाले से गलत साबित किया जिसमें कहा गया था कि इन चारों को दिन के अलग-अलग समयों में नजदीक से गोली मारी गई थी।

तमांग की रपट में कहा गया था कि इन चारों के लश्कर से संबंध के कोई सबूत नहीं हैं। और न ही, इस बात का कोई सबूत है जिससे पता चले कि ये मोदी की हत्या करना चाहते थे।

तमांग की रपट के आधार पर अहमदाबाद की अदालत ने इसे फर्जी मुठभेड़ करार दिया था।

सरकार ने फैसले को गुजरात उच्च न्यायालय में चुनौती दी। तमांग की रपट को अवैध और संदिग्ध बताया क्योंकि इसमें उन 20 पुलिस वालों के जवाब शामिल नहीं थे जो मुठभेड़ में शामिल थे।

गुजरात उच्च न्यायालय ने मामले की आगे की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपी। एसआईटी ने 21 नवंबर 2011 को अपनी रपट में कहा कि मुठभेड़ फर्जी थी। उच्च न्यायालय ने इसमें शामिल लोगों पर हत्या का मामला दर्ज करने का आदेश दिया।

लेकिन, जून 2013 में मीडिया में यह आया कि खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय को बताया है कि एजेंसी के पास इस बात को साबित करने के पर्याप्त सबूत हैं कि इशरत लश्कर के उस माड्यूल का हिस्सा थी जो मोदी की हत्या करना चाहता था।

केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अपनी रपट में कहा था कि मुठभेड़ में अमित शाह का कोई हाथ नहीं है।

कहा जाता है कि हेडली ने 2011 में अमेरिका का दौरा करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से कहा था कि इशरत लश्कर आतंकी थी। गुरुवार को मुंबई की अदालत में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए दी अपनी गवाही में उसने दोहराया कि इशरत पाकिस्तानी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी थी।

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