उदारवादी समाज सुधारक थे राजा राममोहन राय (जन्मदिन विशेष)

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। सदियों पहले ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासन में सुधार के लिए आंदोलन करने वाले और सती प्रथा, अंधविश्वास, बहुविवाह तथा जाति प्रथा का विरोध करने वाले पहले व्यक्ति थे राजा राममोहन राय। उन्होंने समाज सुधार के कई कार्य किए।

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को हुगली जिले के राधानगर गांव में हुआ। इनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही बांग्ला भाषा में हुई थी। पटना में उन्होंने अरबी व फारसी की उच्च शिक्षा प्राप्त किया और काशी में संस्कृत का अध्ययन किया। उन्होंने अंग्रेजी भी सीखी। उनका दृष्टिकोण उदारवादी था।

राजा राममोहन राय ने तिब्बत जाकर बौद्ध धर्म का भी अध्ययन किया। तिब्बत से लौटने पर विवाह होने के बाद पारिवारिक निर्वाह के लिए उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी में क्लर्क की नौकरी कर ली। नौकरी के समय ही उन्होंने अंग्रेजी, ग्रीक और लैटिन भाषाओं का भी ज्ञान प्राप्त किया।

उन्होंने 1914 में आत्मीय सभा बनाई, जिसका उद्देश्य ‘ईश्वर एक है’ का प्रचार करना था। एक ईश्वर की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने ब्रह्मसभा की स्थापना की, जिसे बाद में ब्रह्म समाज के नाम से जाना गया।

राजा राममोहन राय ने विधवाओं का पुनर्विवाह और पुत्रियों को पिता की संपत्ति दिलवाने की दिशा में भी कार्य किया।

सन् 1825 में राजा राममोहन राय ने वेदांत कॉलेज की स्थापना की, जिसमें भारतीय विधाओं के अलावा सामाजिक विज्ञान और भौतिक विज्ञान भी पढ़ाई जाती थी। 8 अप्रैल, 1831 में यह ईस्ट इंडिया कंपनी की शिकायत लेकर इंग्लैंड गए और वहां से पेरिस भी गए।

बंगाल में उन्हें नवजागरण युग का पितामह भी कहा जाता था। उन्होंने अखबार ‘मिरात उल’ और पत्रिका ‘ब्रह्म मैनिकल’ व ‘बंगदूत’ का प्रकाशन भी किया। आजादी के आंदोलन में उन्होंने अपनी पत्रकारिता से आंदोलन को नया रूप दिया। उन्हें हिंदी भाषा से भी बहुत प्यार था।

27 सितंबर, 1833 को राजा राममोहन राय का देहावासान हो गया।

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