भोपाल, 6 मई (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में ओंकारेश्वर बांध का जलस्तर बढ़ाए जाने के विरोध में जल सत्याग्रह कर रहे लोगों के सामने सरकार के तेवर नरम पड़ने लगे हैं। सरकार की ओर से प्रभावितों के एक दल को नरसिंहपुर में पुर्नवास नीति के अनुसार जमीन दिखाई गई मगर प्रभावितों को वह पसंद नहीं आई। सरकारी अमला जमीन को उपजाऊ बता रहा है, जबकि बांध प्रभावित बंजर व अतिक्रमित।
ओंकारेश्वर बांध का जलस्तर 189 मीटर से 191 मीटर किए जाने से कई गांव की खेती की जमीन डूब में आ गई है। सरकार के इस फैसले के विरोध में खंडवा जिले के घोगलगांव में 26 दिन से जल सत्याग्रह चल रहा है। जल सत्याग्रहियों की हालत लगातार बिगड़ रही है।
प्रभावितों की जमीन के बदले जमीन दिए जाने की मांग को ध्यान में रखकर सरकार की ओर से प्रभावितों के आठ सदस्यीय दल को बुधवार को नरसिंहपुर जिले में एक जमीन दिखाई गई। इसे प्रभावितों ने लेने से इंकार कर दिया।
प्रशासन की ओर से एनएचडीसी खण्डवा के भू अर्जन एवं पुनर्वास अधिकारी प्रदीप जैन, तहसीलदार तेन्दूखेड़ा अजय भूषण शर्मा, नरसिंहपुर में पदस्थ नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अधीक्षण यंत्री विनोद कुमार सहगल, नरसिंहपुर में पदस्थ अक्षय उर्जा अधिकारी प्रभात कनौजे, नरसिंहपुर के उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक सी. बी. माकरे आदि ने किसानो के प्रतिनिधिमंडल को नरसिंहपुर में जमीनों का अवलोकन कराया।
अधिकारियों का कहना है कि प्रभावितों को जो जमीन दिखाई गई वह उपजाऊ है और कलेक्टर गाइड लाइन के अनुसार इसकी कीमत छह से 12 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर है। उसके बाद भी प्रभावितों ने इस जमीन को नापसंद कर दिया है।
वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल ने आईएएनएस से कहा है कि उन्हें प्रशासन की ओर से 350 हेक्टेयर जमीन दिखाने की बात कही गई थी, मगर सिर्फ 50 हेक्टेयर जमीन ही दिखाई गई। जो जमीन दिखाई गई वह पूरी तरह बंजर व अतिक्रमित थी, हमारे प्रतिनिधि और जमीन देखना चाहते थे मगर दिखाई नहीं गई। लिहाजा किसान उस जमीन को लेकर क्या करेगा, हम चाहते हैं कि किसानों को उपजाऊ जमीन मिले।
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