रांची, 21 सितम्बर (आईएएनएस)। झारखंड को बिहार से अलग हुए 15 साल बीत चुके हैं। इतना लंबा समय बीतने के बावजूद राज्य की नई राजधानी आज भी कागजों में ही सिमटी हुई है। माना जा रहा है कि नई राजधानी बसाने पर लोगों के विस्थापन और उनके पुनर्वासन जैसे मसलों से निपटने के लिए जरूरी राजनैतिक इच्छाशक्ति का न होना ही इसकी सबसे बड़ी वजह है।
रांची, 21 सितम्बर (आईएएनएस)। झारखंड को बिहार से अलग हुए 15 साल बीत चुके हैं। इतना लंबा समय बीतने के बावजूद राज्य की नई राजधानी आज भी कागजों में ही सिमटी हुई है। माना जा रहा है कि नई राजधानी बसाने पर लोगों के विस्थापन और उनके पुनर्वासन जैसे मसलों से निपटने के लिए जरूरी राजनैतिक इच्छाशक्ति का न होना ही इसकी सबसे बड़ी वजह है।
रांची के हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन इलाके में दो हजार एकड़ क्षेत्र में नई राजधानी का मुख्य भाग बनाया जाना प्रस्तावित है।
सरकारी सूत्रों ने बताया कि राजधानी के मुख्य भाग में सिर्फ सरकारी भवनों को बनाया जाना है। लेकिन, उस इलाके में बसे लोग खुद को वहां से उजाड़े जाने का तीखा विरोध कर रहे हैं।
पूर्व विधायक बंधु तिर्के ने कहा, “लोग यहां बीते 50 सालों से रह रहे हैं। बिना उचित पुनर्वासन के उन्हें यहां से कैसे उजाड़ा जा सकता है।”
तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने 2002 में नई राजधानी की नींव रखी थी लेकिन उसके बाद काम शुरू नहीं हो सका। रिंग रोड की परियोजना आठ साल पहले शुरू हुई थी जो आज तक लटकी हुई है।
यहां तक कि राज्य विधानसभा और सचिवालय भी किराए पर लिए गए भवनों में चल रहे हैं।
मुख्यमंत्री रघुबर दास ने रांची के बाहरी इलाकों में तीन जगहों को देखा लेकिन नई राजधानी के लिए किसी जगह के बारे में फैसला नहीं कर सके। सूत्रों का कहना है कि इसके बाद से तो नई राजधानी की तलाश का काम ठप ही पड़ गया है।
ग्रेटर रांची विकास प्राधिकरण के महानिदेशक सुखदेव सिंह ने कहा, “हम राजधानी का मुख्य भाग बनाएंगे जिसमें विधानसभा, सचिवालय, उच्च न्यायालय और सरकारी भवनों का निर्माण किया जाएगा। उच्च न्यायालय का भवन बनाने का काम सौंपा जा चुका है जबकि विधानसभा के निर्माण के लिए निविदा आमंत्रित करने की प्रक्रिया जारी है। “
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