लखनऊ, 24 मई (आईएएनएस)। जब दिल में आसमां छू लेने की तमन्ना हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। कुछ ऐसा ही जज्बा लखनऊ की बाल विकास परियोजना अधिकारी कामिनी श्रीवास्तव ने दिखाया है। रेल हादसे में दोनों हाथ खो चुकीं कामिनी को ‘भारत भारती सम्मान’ सहित कई पुरस्कार मिले हैं। राष्ट्रपति से लेकर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और कई मुख्यमंत्री भी उनकी कर्मठता को सलाम कर चुके हैं।
लखनऊ, 24 मई (आईएएनएस)। जब दिल में आसमां छू लेने की तमन्ना हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। कुछ ऐसा ही जज्बा लखनऊ की बाल विकास परियोजना अधिकारी कामिनी श्रीवास्तव ने दिखाया है। रेल हादसे में दोनों हाथ खो चुकीं कामिनी को ‘भारत भारती सम्मान’ सहित कई पुरस्कार मिले हैं। राष्ट्रपति से लेकर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और कई मुख्यमंत्री भी उनकी कर्मठता को सलाम कर चुके हैं।
कामिनी श्रीवास्तव ने आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर किया। वह बताती हैं कि मात्र चार वर्ष की उम्र में ही एक रेल हादसे में दोनों हाथ खो चुकने के बावजूद वह शासकीय कार्यो के अलावा हृदयस्पर्शी कविताएं भी लिखती हैं। उप्र के राज्यपाल राम नाईक उनकी कविताओं के संग्रह का विमोचन कर चुके हैं।
कामिनी ने बताया कि उनके पिता धर्मवीर श्रीवास्तव फैजाबाद में रेल चालक थे। जब वह मात्र 4 वर्ष की थी, तभी एक दिन अपने बड़े भाई के साथ रेलवे लाइन पार करते समय वह रेल इंजन से टकरा गई थीं, इस दुर्घटना में उनके दोनों हाथ कट गए थे।
इस हादसे के बाद मानो कामिनी की जिंदगी ही बदल गई। ऐसा लगा, जिंदगी ने उनसे सबकुछ छीन लिया है, लेकिन वह अपनी जीवटता की वजह से ही जीवन की इन कठिन परिस्थतियों में भी उठ खड़ी हुईं और दोनों हाथ गंवाने के बाद पैर से लिखने लगीं।
विषम परिस्थितियों में भी हार न मानते हुए उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की। कामिनी ने फैजाबाद विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विषयों में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की है। किसी की अनुकंपा के बगैर वर्ष 1982 में प्रतियोगी परीक्षा पास कर कामिनी बाल विकास परियोजना अधिकारी के पद पर तैनात हुईं। वर्तमान में वह लखनऊ के काकोरी ब्लॉक में इस पद पर तैनात हैं।
कामिनी कहती हैं, “शासकीय कार्यो को संपादित करने में भी विकलांगता आड़े नहीं आती। कार्यालय में भी पैरों से ही लिखकर सारा कामकाज निपटाती हूं। पैरों से ही लैपटॉप पर भी काम करती हूं। पहले बड़ा ही अजीब लगता था, लेकिन अब आदत-सी पड़ गई है।”
गौरतलब है कि कामिनी को कई राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर के पुरस्कार एवं सम्मान भी प्राप्त हुए हैं। इस विकलांग महिला अधिकारी के कार्यो से खुश होकर वर्ष 1994 में तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सम्मानित किया था। बाद में वर्ष 1997 में उप्र के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सम्मानित किया था।
नारायण दत्त तिवारी और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने भी अपने मुख्यमंत्री काल में कामिनी के जज्बे को सलाम करते हुए उन्हें सम्मानित किया था। शासकीय कार्यो से इतर मर्मस्पर्शी कविताओं में इनकी प्रतिभा को देखते हुए प्रख्यात साहित्यकार लक्ष्मीकांत वर्मा ने भी कामिनी को ‘भारत भारती’ सम्मान से नवाजा था।
कामिनी ने 37 वर्ष की उम्र में आजमगढ़ के स्वतंत्र कुमार श्रीवास्तव से विवाह किया था। वह कहती हैं कि उनके पति यद्यपि व्यवसायी हैं, लेकिन वह उनके हर काम में बड़ा सहयोग करते हैं।
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने हाल ही में कामिनी श्रीवास्तव द्वारा लिखित कविता संग्रह ‘खिलते फूल महकता आंगन’ का लोकार्पण किया है। राज्यपाल ने उनकी कविताओं की सराहना करते हुए कहा था कि उनकी कविताएं जीवन के अनुभव के आधार पर सरल, एवं सीधे हृदय तक पहुंचने वाली भाषा में लिखी गई हैं। वाकई उनका काव्य हृदयस्पर्शी है।
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