कोलकाता, 18 मई (आईएएनएस)। अपनी मातृभूमि से कोसों दूर कोलकाता में बस चुके काबुलीवाले अफगानिस्तान में आतंकवादी हमलों से काफी दुखी हैं। वे यहां पर शरणार्थी की तरह एकांत जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हालांकि उन्हें अब भी उम्मीद है कि जल्द ही उनके देश में शांति व्याप्त होगी।
काबुलीवाला अथवा काबुल से आया व्यक्ति नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्र नाथ टैगोर की एक लघुकथा है जिसे 20वीं सदी की शुरुआत में लिखा गया था।
भारत के पूर्वी महानगर में यह समुदाय अब भी मिलजुलकर रह रहा है और थोड़ी संपन्नता भी अर्जित कर ली है।
21वीं सदी के काबुलीवाला फोटो पत्रकार मोस्का नजीब और नाजेस अफरोज ने ‘काबुल से कोलकाता : यादें पहचान और अपनेपन की’ नाम से एक फोटो प्रदर्शनी लगाई है, जिसमें काबुलीवालोंके जीवन को दर्शाया गया है।
समुदाय के संगठन खुदाई खिदमतगार के अध्यक्ष आमिर खान ने शनिवार को प्रदर्शनी से इतर आईएएनएस से कहा, “जो कुछ भी अफगानिस्तान में हो रहा है वह मानवता नहीं है, इंसानियत नहीं है। हमारा दिल वहीं पर लगा रहता है। उम्मीद है जल्द ही शांति कायम होगी।”
शहर के काशीपुर जैसे इलाकों में लगभग 5,000 अफगानी नागरिक रह रहे हैं। वे लंबी, मोटी और मजबूत कदकाठी के होते हैं और जीवन के प्रति उत्साहित रहते हैं। उनकी पत्नियां भारतीय हैं।
कभी हींग, सूखे मेवे और सूरमा विक्रेता के तौर पर पहचाने जाने वाले काबुलीवाला अब परिवहन, उधार पैसा देने और कपड़ा सीने के काम में उतर आए हैं।
आमिर खान ने कहा, “हमारी खाने की संस्कृति, त्योहार सभी पहले की तरह ही बने हुए हैं। हममें से कुछ अब पैंट और शर्ट पहनने लगे हैं लेकिन जब अवसर की मांग होती है तो हम पारंपरिक सलवार-कमीज और पगड़ी पहनते हैं।”
पिछले कुछ दशकों से उन्होंने हिंदी को भी अपना लिया है।
तीसरी पीढ़ी के पश्तून दौलत खान एक तस्वीर में गर्व से अपनी दादी की देसी पोशाक की ओर इशारा करते हैं।
कपड़ों का व्यापार करने वाले दौलत खान ने कहा, “जितना हमें अपनी परंपराओं को बनाए रखने का गर्व है उतनी ही समानता से हम कोलकाता के त्योहारों में भाग लेते हैं। हम भारतीय शादियों, कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और हमें यहां की संस्कृति से प्यार है। हम सब यहां पर घुल-मिल गए हैं।”
उधार पैसा देने का कारोबार करने वाले शाह खान ने कहा कि वह एक दिन अपने पैतृक गांव फिर से जाना चाहते हैं।
शाह खान ने कहा, “भारत का शुक्रिया, हम यहां पर एक शरणार्थी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हमारे सिर पर छत है, खाना है, शिक्षा है। अफगानिस्तान में आतंकवाद का सामना कर रहे लोगों को इन चीजों के लिए हर दिन लड़ना पड़ता है।”
dharmpath.com dharmpath