‘गुस्से को सही मानते थे गांधी’

साकेत सुमन

साकेत सुमन

अपने शांत व संयत व्यक्तित्व के लिए जाने जाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी गुस्सा को सही मानते थे और कहते थे कि इससे ‘हमें सही व गलत के बीच अंतर करने में मदद मिलती है।’

यह दावा एक नई पुस्तक ‘द गिफ्ट ऑफ एंगर’ में किया गया है, जिसे उनके पांचवें पोते अरुण गांधी ने लिखा है। इसमें राष्ट्रपिता के जीवन के कई अनछुए पहलुओं का जिक्र है और बताया गया है कि दुनियाभर में एक शांत व संयत व्यक्तित्व तथा दार्शनिक व नेता के रूप में मशहूर गांधी ‘वास्तव में एक सामान्य पारिवारिक सदस्य थे।’

लेखक के अनुसार, उनके दादा गांधी का गुस्से से संबंधित सिद्धांत उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी उनका मार्गदर्शन करता रहा।

अरुण गांधी ने अपने दादा के साथ हुई कई बातचीत का जिक्र करते हुए अपनी पुस्तक में गांधी के हवाले से लिखा है, “यह एक सकारात्मक ताकत है, एक ऐसी ऊर्जा है, जो हमें सही और गलत के बीच विभेद के लिए प्रेरित करती है।”

लेकिन गुस्सा सकारात्मक ताकत कैसे हो सकता है और कैसे किसी ने बापू को नाराज नहीं देखा?

लेखक के अनुसार, गांधी ने कभी कहा था, “क्योंकि मैंने अपने गुस्से का इस्तेमाल अच्छे कार्यो के लिए करना सीख लिया है। लोगों के प्रति गुस्सा वाहन में गैस की तरह है, यह आपको आगे बढ़ने तथा बेहतर स्थान पर पहुंचने के लिए प्रेरित करता है। इसके बगैर हम किसी चुनौती का सामना करने के लिए प्रेरित नहीं होंगे। यह एक ऐसी ऊर्जा है, जो हमें सही व गलत के बीच भेद करने के लिए प्रेरित करती है।”

अरुण गांधी ने पुस्तक में उन दिनों का जिक्र किया है, जब वह महात्मा गांधी के साथ महाराष्ट्र के सेवाग्राम आश्रम में दो वर्षो तक रहे थे। ये वे दिन थे, जब महात्मा गांधी दुनिया को बदलने की मुहिम में जुटे थे और लेखक अपने अंदर बदलाव ला रहे थे और अपनी भावनाओं को काबू करने की कोशिश में जुटे थे।

दक्षिण अफ्रीका के डरबन में 1934 में पैदा हुए अरुण गांधी वहां रंगभेद के बीच पले-बढ़े, जहां उन्हें ‘श्वेत’ दक्षिण अफ्रीकियों ने बहुत अधिक अश्वेत होने के लिए और ‘अश्वेत’ दक्षिण अफ्रीकियों ने बहुत अधिक श्वेत होने के लिए पीटा। यह वह दौर था, जब वह अक्सर गुस्सा हो जाया करते थे और ‘आंख के बदले आंख’ के न्याय में यकीन करते थे।

अरुण गांधी केवल 12 वर्ष के थे, जब उनके अभिभावकों ने उन्हें सेवाग्राम में छोड़ दिया, जहां गांधी 1936 से 1948 में अपनी हत्या से पहले तक रहे। अरुण के अनुसार, भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ने वाले देश के सम्मानित व्यक्ति और प्रख्यात दार्शनिक व नेता वास्तव में एक सामान्य पारिवारिक सदस्य थे।

गांधी की 1948 में हत्या से पहले तक सेवाग्राम आश्रम में उनके साथ दो वर्ष बिताने वाले अरुण बताते हैं कि बापू जब कभी उन्हें सीख देते थे तब भी कई बार वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते थे। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि एक बार फुटबॉल खेलने के दौरान एक बच्चे ने जब उन्हें जानबूझकर ठोकर मार दी थी तो वह उसे एक पत्थर दे मारना चाहते थे, लेकिन तभी उनके मस्तिष्क से आवाज आई ‘ऐसा मत करो।’

लेखक के अनुसार, वह अपने दादा के पास गए और उन्हें पूरी बात बताई। यही वह वक्त था, जब गुस्से पर उन्हें दादा से सीख मिली। कुछ महीनों बाद चरखा पर सूत काटते वक्त महात्मा गांधी ने अपने पोते को बुद्धिमत्ता के बारे में बताया।

लेखक यह जानकर हैरान रह गए कि भारत तथा दुनियाभर में बेहद सम्मानित यह शख्स जन्म से ही शांत नहीं थे। अपने बचपन में महात्मा गांधी सिगरेट खरीदने के लिए पैसे चुराते थे और अन्य बच्चों से उनका खूब झगड़ा होता था। वह कई बार अपनी पत्नी (कस्तूरबा) पर चिल्लाए और एक बार तो उन्हें घर से बाहर धक्का देने की कोशिश भी की।

अरुण के अनुसार, “लेकिन वह उस शख्स को पसंद नहीं कर रहे थे, जो वह बन रहे थे। इसलिए उन्होंने खुद को शांत, आत्म-नियंत्रित व्यक्ति के रूप में बदलने की कोशिश की, जो वह बनना चाहते थे।”

लेखक के अनुसार, गांधी की बातों ने उनकी अंतरात्मा को प्रेरित किया कि यदि महात्मा अपने गुस्से पर काबू पा सकते हैं और इसका इस्तेमाल अच्छे कार्यो के लिए कर सकते हैं तो वह भी कर सकते हैं।

पुस्तक में गुस्से के अतिरिक्त आत्म-खोज, अपनी पहचान, तनाव से जूझने, अकेलेपन, मित्रता तथा परिवार से संबंधित गांधी की सीखों का भी जिक्र है।

लेखक के अनुसार, उन्होंने अपने दादा के संरक्षण में दुनिया को नए चश्मे से देखा। पुस्तक में इसका भी जिक्र है कि लेखक ने किस प्रकार अपनी विफलताओं से पार पाना, अपनी भावनाओं को व्यक्त करना तथा गुस्से का इस्तेमाल अच्छे कार्यो के लिए करना सीखा।

(पुस्तक : द गिफ्ट ऑफ एंगर, लेखक : अरुण गांधी। प्रकाशक : पेंगुइन। कीमत : 599 रुपये)

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