नई दिल्ली, 3 अगस्त (आईएएनएस)। जिस प्रकार से आयकर की दर कार्यपालिका पर नहीं छोड़ी जाती और उस पर विधायिका की मंजूरी की जरूरत होती है, उसी प्रकार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर को भी विधेयक में ही सम्मिलित किया जाना चाहिए। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बुधवार को राज्यसभा में यह बात कही।
उन्होंने संविधान संशोधन विधेयक में जीएसटी की दर को भी शामिल करने की बात की, जो उनकी कांग्रेस पार्टी की मुख्य मांग है। उन्होंने यह भी कहा कि जीएसटी की दर अखिल भारतीय स्तर पर 18 फीसदी रखना तर्कसंगत है।
उन्होंने राज्यसभा में कहा, “अधिकार प्राप्त समिति ने पहले 15.5 फीसदी राजस्व तटस्थ दर और 18 फीसदी जीएसटी दर की सिफारिश की है। कांग्रेस ने 18 फीसदी दर रखने की सिफारिश नहीं की है। यह तो आपकी रपट में आया है।”
उन्होंने यह बात पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्रा की अध्यक्षता में गठित समिति की रपट के हवाले से कही।
उन्होंने राज्यसभा में जीएसटी विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा, “अगर इसमें 24-26 फीसदी कर लगाया जाता है तो इससे जीएसटी का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। भारत की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का 57 फीसदी योगदान है। अगर हम इस पर कर बढ़ाते हैं तो मुद्रास्फीति काफी बढ़ जाएगी और कर चोरी को भी बढ़ावा मिलेगा।”
उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे संशोधन विधेयक में क्यों नहीं शामिल किया। उन्होंने कहा, “आज हम संविधान संशोधन विधेयक में कोई दर तय नहीं कर रहे हैं। लेकिन इसे केंद्रीय विधेयक में शामिल किया जाएगा।”
चिंदम्बरम ने कहा कि अप्रत्यक्ष दरों को क्यों कम रखना चाहिए, क्योंकि यह प्रतिगामी प्रकृति की है। उन्होंने कहा, “सॉफ्ट ड्रिंक के मामले को देखें तो अमीर भी इसे खरीदने पर उतना ही कर चुकाता है जितना गरीब आदमी।”
इससे पहले चिंदम्बर ने कहा था कि वे सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी की एक फीसदी अतिरिक्त कर नहीं लगाने की मांग स्वीकार कर ली है।
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा कि जीएसटी का आधार पूरे देश में एक समान कर लागू करना है और अतिरिक्त कर इस विचार के खिलाफ है और विधेयक से इसे हटाया जाना चाहिए।
बाद में प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा कि इस विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा हो रही है “हम वित्त मंत्री से अच्छा जवाब पाने की उम्मीद कर रहे हैं।”
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