चेन्नई/नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे.जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद डीएमके नेता के.अनबझागन ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपना लिखित पक्ष रखा।
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) नेता ने आईएएनएस को बताया, “हमने सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से मिले निर्देश के अनुसार बेंगलुरू उच्च न्यायालय में लिखित पक्ष रखा है। लिखित पक्ष करीब 80 पृष्ठों का है।”
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे में तमिलनाडु सरकार द्वारा विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) की नियुक्ति को कानूनी रूप से गलत ठहराया है।
डीएमके नेता तथा पेशे से वकील अनबझागन ने न्यायालय के फैसले को सकारात्मक करार दिया और कहा किउच्च न्यायालय को फैसला करते वक्त एसपीपी भवानी सिंह की बातों पर भरोरा नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अब कर्नाटक सरकार को अपना पक्ष रखना है।
उन्होंने कहा, “अब इस मामले पर फैसला अनबझागन, कर्नाटक सरकार, जयललिता के वकील की दलील और बेंगलुरू की निचली अदालत के उस फैसले के आधार पर किया जाएगा, जिसमें जयललिता तथा अन्य को दोषी ठहराया गया है।”
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर.के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी. पंत की पीठ ने भवानी सिंह की नियुक्ति को दोषपूर्ण करार दिया और यह भी कहा कि आय से अधिक संपत्ति मामले में जयललिता की याचिका पर आगे सुनवाई की जरूरत नहीं है।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि तमिलनाडु सरकार के पास भवानी सिंह को एसपीपी के तौर पर नियुक्त करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि न्यायालय में मामला कर्नाटक सरकार चला रही है, लिहाजा एसपीपी की नियुक्ति का अधिकार कर्नाटक सरकार के ही पास है।
डीएमके नेता अनबझागन ने तमिलनाडु सरकार की तरफ से की गई नियुक्ति को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह फैसला सुनाया।
तमिनलाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता एवं तीन अन्य आरोपियों को 27 सिंतबर, 2014 को बेंगलुरू की एक अदालत ने आय से अधिक संपत्ति मामले में दोषी ठहराया था। जयललिता ने अदालत के इस फैसले को चुनौती दी थी।
बेंगलुरू की अदालत ने जयललिता को चार साल कारावास की सजा सुनाई थी और 100 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
जयललिता के अतिरिक्त उनकी सहयोगी एन. शशिकला, वी. एन. सुधारकरन और जे. इलावारसी को भी सजा सुनाई गई थी। इन तीनों ने भी उच्च न्यायालय में अपील की थी।
न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति आर. भानुमति की पीठ ने 17 अप्रैल को खंडित फैसला सुनाया था, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले पर सुनवाई की।
न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा था कि भवानी सिंह की नियुक्ति से कर्नाटक उच्च न्यायालय की सुनवाई प्रभावित हुई है, जबकि न्यायमूर्ति भानुमति को भवानी सिंह की नियुक्ति में कानूनी गड़बड़ी नजर नहीं आई थी।
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