रांची, 13 सितंबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एसटी) ने झारखंड सरकार के दो प्रमुख भूमि अधिनियमों में अध्यादेश के जरिए प्रस्तावित बदलाव को खारिज कर दिया है।
राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने आईएएनएस से कहा, “हमने राज्य सरकार के दो भूमि अधिनियमों में बदलाव लाने के अध्यादेश के खिलाफ सलाह देते हुए केंद्र सरकार को रिपोर्ट सौंप दी है।”
झारखंड की रघुवर दास सरकार ने जून में दो भूमि अधिनियमों में बदलाव के लिए अध्यादेश लाया था। इसमें छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीटीए) और संथाल परगना काश्तकारी (एसपीटी) अधिनियम शामिल हैं।
उरांव ने कहा, “इन दो भूमि अधिनियमों में बदलाव से जनजातीय संस्कृति और भावना को नुकसान पहुंचेगा। इन भूमि अधिनियमों को ब्रिटिश शासन के दौरान जनजातीय भूमि की रक्षा के लिए बनाया गया था।”
उन्होंने कहा, “हमारी राय कई दलों के नेताओं से बातचीत पर आधारित है। यहां तक कि सत्तारूढ़ भाजपा के कार्यकर्ता भी किसी बदलाव के पक्ष में नहीं हैं।”
यदि यह अध्यादेश को मंजूरी मिलती है तो जनजातीय भूमि गैर-कृषि कार्यो जैसे सड़क, बिजली सयंत्र, माल्स और दूसरे कार्यो के लिए अधिग्रहित की जा सकती है।
उरांव ने कहा, “इस बदलाव से भूमि अधिनियमों की भावना को चोट पहुंचेगी। एक अनुच्छेद के अनुसार, अध्यादेश के प्रभावी हो जाने के बाद, जनजातीय भूमि के अधिग्रहण के लिए उपायुक्त की मंजूरी की भी जरूरी नहीं होगी।”
उन्होंने यह भी कहा कि अध्यादेश में कृषि से गैर कृषि कार्य के लिए भूमि की प्रकृति में बदलाव लाने का प्रस्ताव दिया गया है।
झारखंड के राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू पहले ही अध्यादेश को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी के लिए भेज चुके हैं। इसको लेकर राज्य की विपक्षी पार्टियां राष्ट्रपति मुखर्जी से मिलकर अध्यादेश को मंजूरी नहीं देने का आग्रह कर चुकी हैं।
मुखर्जी ने इस पर केंद्र सरकार का विचार जाना चाहा। इस पर केंद्र ने इसे केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय को इसे भेज दिया।
यह मंत्रालय राष्ट्रीय जनजातीय आयोग की राय लेता है।
झारखंड में इस कदम की वजह से जुलाई से प्रदर्शन हो रहे हैं।
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