अंकारा, 7 मार्च (आईएएनएस)। तुर्की के विदेश मंत्री ने मंगलवार को जर्मनी के साथ ‘जुबानी जंग’ को हवा देते हुए कहा कि जनमत संग्रह अभियान को जर्मन शहर हैम्बर्ग ले जाने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता। जर्मनी के अधिकारियों ने तुर्की के इस कार्यक्रम को रद्द करने का आदेश दिया है।
एफे न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी में तुर्की के करीब 14 लाख वैध मतदाता रहते हैं, जो तुर्की के संसदीय गणतंत्र को राष्ट्रपति शासन व्यवस्था में तब्दील करने के सिलसिले में हो रहे जनमत संग्रह में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। राष्ट्रपति शासन व्यवस्था होने से वर्तमान राष्ट्रपति रेसेप तईप एडरेगन की ताकत में इजाफा हो जाएगा। जनमत संग्रह 16 अप्रैल को होगा।
तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत कावुसोग्लू ने दैनिक हुर्रियत से कहा, “अप्रत्याशित दबाव के तहत वह हमारी सभी रैलियों को रद्द करने का प्रयास कर रहे हैं। यह पूरी तरह दमकनकारी है, जिससे निजी होटलों के मालिक दबाव में हैं।”
उन्होंने कहा, “मैं जा रहा हूं। मुझे कोई नहीं रोक सकता।”
उत्तरी जर्मनी के शहर हैम्बर्ग के अधिकारियों ने सोमवार को उस बैठक को रोक दिया, जिसकी अध्यक्षता कावुसोग्लू करने वाले थे।
विदेश मंत्री ने बैठक के रद्द होने की पुष्टि की, लेकिन कहा कि इसकी जगह बदल दी गई है।
जर्मनी की सरजमीं पर तुर्की के जनमत संग्रह को लेकर रैलियों पर सरकार द्वारा शिकंजा कसने तथा तुर्की द्वारा तुर्की मूल के एक जर्मन पत्रकार को आतंकवाद के आरोपों में हिरासत में लेने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है।
हाल में एडरेगन ने जर्मनी की सरकार की कार्रवाई की आलोचना करते हुए उसकी तुलना नाजी शासनकाल से की थी।
तुर्की के संविधान को राष्ट्रपति के पक्ष में बनाने को लेकर होने वाले जनमत संग्रह से पश्चिमी देशों की भौहें तन गई हैं। एडरेगान के आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति की कोशिश तानाशाह जैसे अधिकार हासिल करने की है।
जुलाई 2016 में असफल तख्तापलट के बाद तुर्की ने कई सरकारी संस्थानों का पुनर्गठन किया है और अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे धर्मगुरु फतेउल्लाह गुलेन से कथित संपर्क को लेकर हजारों लोगों को गिरफ्तार किया है। तुर्की ने तख्तापलट के प्रयास का आरोप गुलेन पर लगाया है।
तुर्की ने जर्मनी पर गुलेन तथा प्रतिबंधित कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) के हाथों की कठपुलती बनने का आरोप लगाया है।
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