हरिद्वार, 22 जनवरी (आईएएनएस)। तीर्थ नगरी हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय तथा विश्वविद्यालय के कूड़े-कचरे का प्रबंधन नगरपालिका और ठोस कचरा प्रबंधन कंपनियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान विभाग के डॉ. सुशील भदूला के निर्देशन में विभाग की छात्रा प्रज्ञा साहू ने एक शोध किया है। उन्होंने पाया कि कचरों का सुनियोजित प्रबंधन न होने की वजह से शहरों में तरह-तरह की बीमारियां जन्म ले रही हैं।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में किए गए शोध में पता चला है कि शांतिकुंज से औसतन 632.1 किलोग्राम व देव संस्कृति विवि से 268.5 किलोग्राम कचरा प्रतिदिन निकलता है, जिसका प्रबंधन विश्वविद्यालय परिसर में ही किया जाता है। इसमें अजैविक कचरे का पुनर्चक्रण तथा जैविक कचरे से प्राकृतिक खाद का निर्माण किया जा रहा है।
डॉ. भदूला ने बताया विश्वविद्यालय द्वारा जैविक व अजैविक कचरे को एक-दूसरे से अलग करने के लिए प्रत्येक आवासीय भवनों में अलग-अलग रंगों वाले कूड़ेदान लगाए गए हंै, जो कूड़े-कचरे के प्रबंधन में मदद करते हैं।
इन दिनों हरिद्वार में अर्धकुम्भ चल रहा है। आने वाले तीन महीनों में स्नान पर्वो पर लाखों-करोड़ों की भीड़ हरिद्वार पहुंचेगी। ऐसे में डॉ. भदूला व अन्य पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि शहर में ढेर सारा कचरा निकलेगा, जिसके प्रबंधन के लिए उचित तकनीक अपनाने की जरूरत है।
कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने बताया कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय की मातृसंस्था शान्तिकुंज एवं गायत्री परिवार द्वारा नर्मदा, ताप्ती, गंगा आदि नदियों पर पर्यावरण संरक्षण के अनेक कार्य किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में ताप्ती में विसर्जित होने वाली पूजा सामग्रियों को इकट्ठा कर उसे जैविक खाद बनाने का कार्य किया जा रहा है।
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