निजी क्षेत्र हो सकता है उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक : जेजीयू वीसी (आईएएनएस साक्षात्कार)

नई दिल्ली, 28 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में निजी क्षेत्र की अहम भूमिका हो सकती है। यह बात हरियाणा के सोनीपत स्थित ओ. पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (जेजीयू) के कुलपति प्रोफेसर सी. राजकुमार ने कही।

नई दिल्ली, 28 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में निजी क्षेत्र की अहम भूमिका हो सकती है। यह बात हरियाणा के सोनीपत स्थित ओ. पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (जेजीयू) के कुलपति प्रोफेसर सी. राजकुमार ने कही।

प्रोफेसर राजकुमार का कहना है कि वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे कुछ संस्थानों को छोड़कर बाकी भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों से देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच बढ़ाने में निजी क्षेत्र की महती भागीदारी साबित हो रही है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के रोड्स शोधार्थी रहे प्रोफेसर राजकुमार जेजीयू के संस्थापक कुलपति हैं। उन्होंने ऑक्सफोर्ड से सिविल लॉ में स्नातक (बीसीएल) की डिग्री हासिल की। वह हार्वर्ड लॉ स्कूल में लैंडन गैमन फेलो रहे हैं।

वर्ष 2009 में कुलपति का पदभार संभालने के बाद विगत नौ साल में उन्होंने अपने कुशल संचालन व मार्गदर्शन में संस्थान को आगे ले जाने में महती भूमिका निभाई। क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग-2019 के अनुसार, जेजीयू को एशिया के शीर्ष 450 विश्वविद्यालयों में शामिल किया है, जिसका श्रेय उन्हीं को जाता है।

आईएएनएस को ईमेल के जरिए दिए एक साक्षात्कार में प्रोफेसर राजकुमार ने उच्च शिक्षा से संबंधित कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला।

भारत के उच्च शिक्षा की बदहाली के कारणों और उसमें सुधार की जरूतरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “भारत में उच्च शिक्षा पद्धति अत्यधिक विनिमयन के दबाव में है। सरकार की हालिया नीतियों में यह स्पष्ट हो गया है। हालिया नीतियों का मकसद बेहतर प्रदर्शन करने वाले संस्थानों, विशिष्ट योजनाओं के संस्थानों के लिए ग्रेडेड ऑटोनोमील जैसी पहलों के माध्यम से विनियमन की निगरानी को कम करना है।”

उन्होंने कहा, “इससे चुनींदा संस्थानों को नियुक्ति प्रवेश, सहयोग जैसी महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्वनियमन की अनुमति होगी। हालांकि देश में उच्च शिक्षा के पैमाने, पहुंच और सापेक्ष गुणवत्ता में फर्क होने से प्रदर्शन और गुणवत्ता के साथ क्षेत्र के तीव्र विस्तार का समान बनाने के लिए आगे सुधार की सख्त जरूरत है।”

उन्होंने कहा, “उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए हमें उद्योग समेत निजी क्षेत्रों की भागीदारी की भी अत्यंत आवश्यकता है।”

भारत के विश्वविद्यालयों के विश्वस्तरीय पहचान हासिल करने की राह की बाधाओं के संबंध में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, “अगर टाइम्स हायर एजुकेशन, क्वेकक्वारेली साइमंड्स और अकेडमिक रैंकिंग ऑफ वर्ल्ड यूनिवर्सिटीज जैसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों की रैंकिंग के पैरामीटर (प्राचलों) पर गौर करें तो सबमें एक समान मानक देखने को मिलते हैं जिनमें शोध, ख्याति और अंतर्राष्ट्रीयकरण शामिल हैं। भारतीय विश्वविद्यालयों में मुख्य रूप से शिक्षण पर ध्यान दिया जाता है और शोध पर कम ध्यान दिया जाता है। दूसरा, यह कि उच्च शिक्षा में अंतर्राष्ट्रीयकरण पर वर्तमान में सरकार का अत्यधिक विनियमन है।”

यहां अंतर्राष्ट्रीयकरण से अभिप्राय विदेशी संकाय सदस्यों की नियुक्ति, विदेशी छात्रों का प्रवेश, छात्रों के भ्रमण संबंधी कार्यक्रम आदि से है।

उन्होंने कहा कि विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में आने के लिए भारतीय विश्वविद्यालयों को शोध के प्रभाव व नतीजों की प्राथमिकता तय करने की जरूरत है।

प्रोफेसर राजकुमार ने कहा, “भारतीय विश्वद्यालयों में वित्तपोषण की काफी जरूरत है, जोकि सार्वजनिक और निजी दोनों स्रोतों से आना चाहिए। साथ ही विनिमयन में ढील देने की आवश्यकता है।”

उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अलाभ प्रणाली में निजी क्षेत्रों की सार्थक भागीदारी की आवश्यकता है, जहां कॉरपोरेट और धनवान लोग गुणत्तापूर्ण उच्च शिक्षा की पहुंच बनाने में सहयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि ओ. पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

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