पटना, 8 दिसंबर (आईएएनएस)। पटना के सम्राट अशोक कन्वेंशन सेंटर के ज्ञान भवन में चल रहे 24वें पटना पुस्तक मेले के सातवें दिन शुक्रवार को ‘कथा साहित्य का सामाजिक सरोकार’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया तथा निवेदिता झा के कविता संग्रह ‘प्रेम में डर’ पर बातचीत की गई। ‘कोरस’ संस्था द्वारा पेश नुक्कड़ नाटक ‘मन की बात’ ने माहौल को और गंभीर बनाया।
इस नाटक के जरिए न केवल नारियों की पीड़ाओं को दिखाया गया, बल्कि कथित ‘बाबाओं’ की संस्कृति पर भी व्यंग्यात्मक चोट की गई।
सेंटर फॉर रीडरशिप डेवलपमेंट (सीआरडी) और कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा आयोजित 10 दिवसीय पुस्तक मेले में लेखिका और निर्देशिका समता राय द्वारा निर्देशित ‘मन की बात’ नाटक में नारियों की तमाम पीड़ाओं को व्यक्त किया गया है।
केवल दो पात्रों के इस नाटक में समता राय और मात्सी शरण ने अपनी सधी हुई भूमिका से लोगों की वाहवाही लूटी, दर्शकों ने भी इसका भरपूर आंनद लिया।
नाटक में जहां ‘रामायण’ की पात्र सीता और अहिल्या के माध्यम से स्त्रियों की पीड़ा को दिखाया गया है, वहीं रूढ़ियों, वर्जनाओं और विज्ञापनों पर भी चोट की गई। नाटक का अंत भी रोचक तरीके कवि गोरख पांडेय की कविता ‘ये आंखें हैं तुम्हारी तकलीफ का उमड़ता समंदर, इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए’ से की गई।
उधर, कस्तूरबा मंच पर ‘कथा साहित्य का सामाजिक सरोकार’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा की शुरुआत करते हुए साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा कि साहित्य में सरोकार प्रारंभ से है और इसके सबसे बड़े पैरोकार महान लेखक प्रेमचंद हैं। उन्होंने कहा कि जैसा समाज होता है, वैसा ही साहित्य में परिलक्षित होता है। सरोकार वाली रचनाएं कालजयी होती हैं।
इस विषय पर कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा कि कहानियों में समाधान नहीं होता, लेकिन यह अधिकांश लोगों तक पहुंचती है। उन्होंने लेखन में बाजारवाद के दबाव को स्वीकार करते हुए कहा कि यह प्रारंभ से होता आ रहा है।
उन्होंने कहा कि कई बार बिकाऊ लेखन अतिलोकप्रियता के लिए भी होता है। आज के समाज को व्यक्तिवादी बताते हुए उन्होंने कहा कि आज समाज में न केवल संवेदनहीनता आ गई है, बल्कि जातियों और धर्मो में विघटन भी चरम पर है।
वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित ने परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा कि समाज नहीं होगा, तो साहित्य की कल्पना ही बेमानी है। उन्होंने कहा, “समाज ही निर्धारित करता है कि समाज कैसा होगा। विश्व की घटनाओं का भी प्रभाव साहित्य पर पड़ता है।”
उन्होंने लेखकों को अपने सरोकार को स्पष्ट करने की सलाह देते हुए कहा कि ऐसा नहीं करने वाले लेखकों को ही संदिग्ध माना जाएगा।
इसी मंच पर निवेदिता झा के कविता संग्रह ‘प्रेम में डर’ पर कथाकार गीता श्री ने बातचीत की। निवेदिता ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि हमारे समाज में प्रेम को एक अपराध माना जाता है, मगर हकीकत है कि प्रेम से दुनिया का विस्तार होता है।
निवेदिता ने अपनी कविता में शायर फैज अहमद फैज और कैफी आजमी का गहरा प्रभाव पड़ने को स्वीकार करते हुए कहा कि संकुचित समाज में चीजें सड़ने लगती हैं। अपनी कविता में ‘राम’ के बार-बार जिक्र आने के प्रश्न पर उन्होंने कहा, “राम को मैं बहुत ही काव्यात्मक चरित्र मानती हूं। वैसे, मेरी कविताएं सबके लिए हैं।”
पटना पुस्तक मेले के 24वें संस्करण का विषय लड़कियों और महिलाओं को समर्पित है। इस बार का विषय ‘लड़की को सामथ्र्य दो, दुनिया बदलेगी’ रखा गया है।
दो दिसंबर को शुरू यह पुस्तक मेला 11 दिसंबर तक चलेगा। इसमें बिहार और देशभर के 112 प्रकाशक भाग ले रहे हैं। मेले में 210 स्टॉल लगाए गए हैं।
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