‘पठानकोट अभियान में सीमित नहीं थी सेना की भूमिका’

चंडीगढ़, 6 जनवरी (आईएएनएस)। सेना के एक वरिष्ठ कमांडर ने बुधवार को कहा कि पठानकोट के वायुसेना अड्डे पर आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में सेना की भूमिका सीमित नहीं थी।

पश्चिमी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.सिंह ने चंडीमंदिर स्थित कमान मुख्यालय में कहा, “यह सही नहीं है कि सेना की भूमिका सीमित थी। पहला मुकाबला डीएससी और गरुड़ का हुआ। डीएसी बहुत बहादुरी से लड़े। इनमें से एक ने एक आतंकवादी को मार गिराया। दूसरे आतंकवादी की गोली से वह मारा गया।”

उन्होंने कहा, “दूसरा मुकाबला सैन्य टुकड़ी से हुआ। इसके बाद एनएसजी ने इन पर काबू पाया। यह विशेष बलों, गरुड़ और एनएसजी का संयुक्त अभियान था।”

उन्होंने कहा कि सेना के बम निरोधक दस्ते ने अभियान में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

पठानकोट आतंकी हमले से निपटने के मामले में केंद्र सरकार की रणनीति की आलोचना हो रही है। खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) को आतंकियों से मुकाबले के लिए तैनात किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि देश का सबसे बड़ा कैंटोनमेंट, मामून सैन्य कंटोनमेंट पठानकोट के पास में ही है। यहां 50 हजार प्रशिक्षित सैन्यकर्मी हैं। इनका इस्तेमाल आतंकियों के खिलाफ किया जाना चाहिए था। इन्हें आतंकियों से निपटने का अनुभव है, साथ ही ये इलाके के भूगोल से भी अच्छी तरह परिचित हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने अभियान को चार दिन तक खींचने को सही बताते हुए कहा कि बहुत बड़े इलाके की छानबीन की जानी थी और सुरक्षा की दृष्टि से इसे सही स्थिति में लाना था।

उन्होंने कहा, “वास्तविक मुठभेड़ तो केवल 10-11 घंटे की थी। बाकी समय आतंकवादी छिपे ही रहे।”

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी की जांच में पता चल जाएगा कि आतंकवादी किस रास्ते से घुसे और इसका समय क्या था।

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