नई दिल्ली, 31 मार्च (आईएएनएस)। वाशिंगटन में आयोजित चौथे परमाणु सुरक्षा सम्मेलन के दौरान भारत परमाणु आतंकवाद के खतरे के समाधान पर जोर देगा। साथ ही नई दिल्ली को उम्मीद है कि सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले देश परमाणु शक्ति के सुरक्षित प्रसार के प्रति भरोसे को बरकरार रखेंगे।
सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए अमेरिका रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “परमाणु आतंकवाद के कारण पैदा हुए परमाणु सुरक्षा के खतरे के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सम्मेलन के दौरान विचार-विमर्श होगा।”
उन्होंने कहा, “नेता उन उपायों व तरीकों पर विचार-विमर्श करेंगे, जिनके माध्यम से वैश्विक परमाणु सुरक्षा संरचना को मजबूत किया जा सकेगा, ताकि परमाणु सामग्रियों तक गैर सरकारी तत्व की पहुंच नहीं हो सके।”
अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने कहा, “परमाणु सुरक्षा के मामले में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और परमाणु हथियारों व परमाणु सामग्री के मामले में उसे एक प्रबंधक के रूप में जिम्मेदार भूमिका निभानी है।”
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा गुरुवार को ‘परमाणु सुरक्षा के लिए खतरों की अवधारणा’ विषय पर भोजन के दौरान एक चर्चा के बाद 53 देशों व चार अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के नेता शुक्रवार को तीन सत्रों में बैठक में शामिल होंगे, जिस दौरान परमाणु सुरक्षा व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे।
विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (निरस्त्रीकरण व अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मामले) अमनदीप सिंह गिल ने सम्मेलन को लेकर एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा, “भारत उम्मीद करता है कि यह सम्मेलन परमाणु आतंकवाद के प्रति उच्च-स्तरीय जागरूकता बढ़ाने तथा आतंकवादियों एवं परमाणु तस्करों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने की जरूरत को लेकर योगदान में इजाफा करेगा।”
गिल ने कहा कि भारत यह भी उम्मीद करता है कि यह सम्मेलन परमाणु शक्ति के सुरक्षित प्रसार के प्रति दृढ़ विश्वास बनाए रखेगा, जो गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा के क्षेत्र में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्यों तक पहुंचने में एक महत्वपूर्ण आवश्यकता होगी।
उन्होंने कहा, “इस बिंदू को रेखांकित करने के लिए मैं इस बात का उल्लेख करना चाहता हूं कि परमाणु आतंकवाद के रूप में समस्या परमाणु सामग्री, सुविधा या प्रौद्योगिकी नहीं है, बल्कि समस्या आतंकवाद से जुड़े पहलुओं से है, जिस पर हमें ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।”
भारत यह भी उम्मीद करता है कि जिन्होंने सुरक्षित परमाणु प्रसार को लेकर कुछ नहीं किया है, वे ऐसा करें और परमाणु सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों के कायदे-कानून पर गौर करें।
इनमें इंटरनेशनल कन्वेंशन ऑन द सप्रेशन ऑफ एक्ट्स ऑफ न्यूक्लियर टेररिज्म, कन्वेंशन ऑन द फिजिकल प्रोटेक्शन ऑफ न्यूक्लियर मेटेरियल (2005 में संशोधित), संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1540 (साल 2004 में स्वीकृत) शामिल हैं, जो परमाणु सामग्रियों व हथियारों को गैर सरकारी तत्वों के हाथ पड़ने और उसके निर्यात से रोकते हैं।
गिल के मुताबिक, दूसरे मुद्दे के तहत भारत यह उम्मीद करता है कि सक्षम संस्थानों- खासकर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए)- को पर्याप्त संसाधनों -मानवीय व वित्तीय दोनों से पूरी तरह लैस होना चाहिए, ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को सुनिश्चित कर सकें और हमारी परमाणु सुरक्षा को मजबूत करने के राष्ट्रीय प्रयास की जरूरत का समर्थन कर सकें।
शुक्रवार को होने वाले सत्र के दौरान भारत अपना राष्ट्रीय प्रगति रिपोर्ट भी सौंपेगा।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप के मुताबिक, साल 2014-16 के दौरान सम्मेलन की तैयारी की बैठकों के दौरान भारत ने रचनात्मक योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में परमाणु सुरक्षा को लेकर अपने भाषण के दौरान कुछ विशेष घोषणाएं व प्रस्ताव पेश करेंगे।
दूसरे सत्र के दौरान, चर्चा परमाणु सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के योगदान पर केंद्रित होगा।
सम्मेलन का तीसरा और अंतिम सत्र काल्पनिक परिदृश्य के आधार पर परमाणु आतंकवाद को लेकर नीति पर नेता चर्चा करेंगे।
संयुक्त विज्ञप्ति को स्वीकार करने के साथ ही सम्मेलन का समापन हो जाएगा।
इस तरह का पहला सम्मेलन अप्रैल 2010 में वाशिंगटन में हुआ था, जबकि दूसरा मार्च 2012 में सियोल में और तीसरा हेग में मार्च 2014 में हुआ था।
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