पानी पर भारत का विक्रांत

0,,17012936_303,00 (2)भारत ने देश में बना पहला विमानवाहक युद्धपोत सोमवार को पानी में उतार दिया. पांच अरब डॉलर से ज्यादा खर्च वाले समुद्री बेड़े को तैयार करने का मकसद अपनी ताकत बढ़ाने के साथ चीन के बढ़ते असर को चुनौती देना भी है.
आईएनएस विक्रांत 2018 में जब अपने साजो सामान के साथ पूरी तरह सेना की सेवा में आएगा तब भारत दुनिया का पांचवां ऐसा देश होगा जिसके पास खुद का बनाया विमानवाही युद्धपोत है और इस मामले में वह चीन से आगे निकल गया होगा. इस कतार में अभी ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और अमेरिका का ही नाम शामिल है. कोच्चि में युद्धपोत को पानी में उतारे जाते समय मौजूद रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने कहा, “यह एक असाधारण मील का पत्थर है. यह एक लंबे सफर का केवल पहला कदम है लेकिन साथ ही बेहद जरूरी भी.”
युद्धपोत को अभी साजो सामान और हथियारों से लैस किया जाएगा और चार साल तक परीक्षण होगा इसके बाद ही यह पूरी तरह सेवा देने के काबिल होगा. रक्षा जानकारों का मानना है कि यह एशिया में अपने प्रभाव के लिए बाकी देशों से मुकाबला कर रहे भारत को आगे ले जाएगा. आईएचएस जेन्स डिफेंस वीकली के रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी का कहना है, “यह हिंद महासागर के क्षेत्र में तैनात किया जाने वाला है जहां दुनिया के कारोबारी और आर्थिक हित मिलते हैं. भारत की क्षमता बहुत कुछ चीन की क्षमता को ध्यान में रख कर है. यह सभी ताकत दिखाने वाले मंच हैं जिनसे भारत की ताकत को कूटनीति के विस्तार के रूप में दिखाया जा सके.”
आईएनएस विराट
भारत अरबों डॉलर खर्च कर सोवियत युग के अपने सैनिक साजो सामान को सुधार कर रक्षा तैयारियां मजबूत कर रहा है. लंबी दूरी की मिसाइल और नौसेना कार्यक्रमों की सफलता अपना विमान और दूसरे हथियार बनाने में नाकामी से प्रभावित हुई है. ऐसे में भारत को बहुत हद तक विदेशों से आयात पर निर्भर होना पड़ा है. आईएनएस विक्रांत अपने तय समय से दो साल पीछे चल रहा है. इसके लिए खास तरह का स्टील रूस से आना था जिसमें देरी हुई. इसके अलावा इसी तरह के कुछ दूसरे कारणों ने भी देरी में योगदान दिया.
इस युद्धपोत से चीन को चुनौती देने की बात कही जा रही है, लेकिन भारत रक्षा क्षमता के मामले में चीन से बहुत पीछे है. हां इतना जरूर है कि विमानवाही युद्धपोत अपने देश में तैयार कर लेना एक अहम कदम है. चीन का पहला विमानवाही युद्ध पोत पिछले साल सितंबर में सेवा में आया जो उसने यूक्रेन से खरीदा है. चीन भी भविष्य में बड़े युद्धपोत बनाने या किसी दूसरे देश से हासिल करने की तैयारी कर रहा है.
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भारत के पास पहले से ही एक विमानवाही युद्धपोत सेवा में है. 60 साल पुराना ब्रिटिश युद्धपोत आईएनएस विराट 1987 से ही देश की समुद्री सीमा की निगहबानी कर रहा है. हालांकि यह आने वाले वर्षों में धीरे धीरे सेवामुक्त हो जाएगा. भारत का सहयोगी रूस भी उसे एक विमानवाही युद्धपोत सौंपने वाला है. आईएनएस विक्रमादित्य नाम के इस रूसी युद्धपोत के इस साल के आखिर तक भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल होने का अनुमान है.
40 हजार टन का आईएनएस विक्रांत रूस में बने मिग 29 लड़ाकू विमान और दूसरे हल्के विमानों को अपने साथ लेकर चलेगा. इसका ढांचा, डिजाइन और कुछ मशीनें तो भारत में बनी हैं लेकिन इस पर लगे ज्यादातर हथियार विदेशों से आयात किए गए हैं. युद्धपोत का प्रोपल्सन सिस्टम भी अमेरिकी कंपनी जीई ने तैयार किया है.
नौसेना से रिटायर हो चुके रियर एडमिरल के राजा मेनन ने बताया, “इसकी प्राथमिक भूमिका हमारे नौसेना बेड़े की सुरक्षा होगी और यह जमीन पर हमले के लिए इस्तेमाल नहीं होगा.” रक्षा जानकार सी उदय भास्कर भी नौसेना के रिटायर्ड अधिकारी और दिल्ली के नेशनल मैरिटाइम फाउंडेशन के पूर्व निदेशक हैं. उन्होंने बताया कि युद्धपोत, “भारत की विश्वसनीयता बढ़ाएगा लेकिन चीन के साथ ताकत के संतुलन को नहीं बदल सकेगा. चीन की परमाणु कुशलता और पोत बनाने की क्षमता काफी उच्च स्तर की है.”
भारतीय नौसेना फिलहाल 39 युद्धपोतों के साथ काम कर रही है और इसने दो और विमानवाहक युद्धपोत की योजना बनानी शुरू कर दी है.

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