पितरों के तर्पण के साथ विश्व की समस्त दिवंगत आत्माओं का किया तर्पण पितृ मोक्ष अमावश्या को व्यारमा नदी के तट पर ब्रम्हमुर्हुत में किया तर्पण ब्राम्हणों के साथ अन्य वर्ग के लोगों ने की सहभागिता,लिया आशीष

156दमोह/जिप्र/ सरिता के पवित्र जल में स्वेत वस्त्रों में डूबे लोग और वेदिक मंत्रों के उच्चारण से गूंजायमान होता क्षेत्र,अंजली में जल के साथ कुशा को लिये अपने पितरों सहित विश्व की समस्त दिवंगत आत्माओं को तर्पण के माध्यम से जल अर्पित करते लोग जी हां कुछ एैसा ही नजारा था जिले की व्यारमा नदी का जहां ब्रम्हमुर्हुत में ही उक्त कार्य प्रारंभ हो चुका था। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम बलारपुर के समीप से निकली व्यारमा नदी में जिले के कुछ ब्राम्हणों ने पं.महेश पांडे के नेतृत्व में एकत्रित हो उक्त पवित्र कार्य को सम्पन्न किया तो अनेक वर्ग के लोगों ने भी सहभागिता करते हुये पितरों का तर्पण किया। पितृमोक्ष अमावश्या के पवित्र अवसर पर जहां इन लोगों ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया तो वहीं दूसरी ओर विश्व की उन समस्त दिवंगत आत्माओं का तर्पण भी किया जो या तो असमय काल के गाल में समा गयी या फिर जिनका तर्पण करने वाला कोई उनका वंशज नहीं है। अपने पूर्वजों के साथ इनको भी इन्होने भगवान विष्णु से अपने चरणों में स्थान देने की कामना भी की। तो सभी के निरोग,सुखी रहने का आर्शीवाद भी मांगा। लगभग दो घंटे से अधिक समय तक चले उक्त कार्यक्रम के दौरान शास्त्रों में वर्णित लगभग सभी प्रकार से पूजन हवन भी किया गया। इस अवसर पर पं.डा.लक्ष्मीनारायण वैष्णव,पं.पंकज दुबे,पं.हरिशंकर गोस्वामी,पं.वीरेन्द्र हजारी,पं.आलोक तिवारी,पं.प्रमेश सिरोठिया,पं.राजेन्द्र तिवारी,पं.जयप्रकाश दुबे,पं.रविदत्त बडगैंया,पं.बलराम तिवारी,पं.सुशील तिवारी,पं.आरके गोस्वामी,पं.गणेश मिश्रा,पं.पप्पू महाराज,एच.एन.श्रीवास्तव,परम विश्वकर्मा,अनिल खरे,बबलू साहू,अजय सोनी,केएल असाटी,कल्लू राय,धनी रैकवार,गगन रैकवार,भगवान दास पटेल,देवेन्द्र सेन एवं लखन यादव ने प्रमुख रूप से उपस्थित होकर उक्त कार्य को वैदिक रीति रिवाज से किया।
क्या है विधान-
भाद्रपद पूर्णिमा से ही महालया आरम्भ होता है। आश्विन मास की प्रथम तिथि प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक पितरो के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का शास्त्र सम्मत विधान है स्मरण करने के लिये ही पितृपक्ष की अमावस्या को पितृ विसर्जन के साथ पितृ पक्ष समाप्त होता है तथा शारदीय नवरात्र का प्रारम्भ हो जाता है। धर्मशास्त्रों मे कहा गया है कि पितरलोक से आये हुये पितृ महालय भोजन मे पूर्ण रुपेण तृप्त होकर अपने लोक को प्रस्थान करते हैं तथा सेवक को परिजनों को आर्शीवाद देते हैं मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करते हैं सन्तुष्ट होने पर अनिष्ट कारक घटनाओं से परिजनो स्वजनो आदि को बचाते भी हैं शास्त्र सम्मत है कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितरों को जल देकर, मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करके पितृ ऋण चुकाया जाता है।  वैदिक परम्परा का निर्वाहन करके उन पूर्वजों को पितर मानते हैं जिनकी स्मृति को हम पूर्ण श्रद्धा भाव से नमन करते हैं पूर्ण श्रद्धा भाव से पिता, पितामह, प्रपितामह को दिया जाने वाला पिण्ड, पुष्प, जल, दक्षिणा आदि स्मृति और श्रद्धा का प्रतीक होने के कारण श्राद्ध शब्द का नाम दिया गया है।
वैज्ञानिक महत्च:-
जब सूर्य कन्या राशि मे प्रवेश करता है तो उस समय सूर्य पृथ्वी के अति निकट होता है सूर्य की तेज किरणों से पृथ्वी सहित पशु पक्षी तक व्याकुल हो उठते हैं इसकी समय पितरों का पृथ्वी पर आगमन होता है भूखे प्यासे पितरों को जल दान देने की परम्परा का मुख्य कारक सूर्य जी ही हैं। शुक्ल पक्ष मे चन्द्रमा सूर्य से दूर हो जाता है जिससे चन्द्रमा पर पडऩे वाला सूर्य का प्रकाश कम रहता है शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पितरों की मध्यरात्रि मानी गयी है कृष्ण पक्ष का प्रारम्भ होते ही चन्द्रमा धीरे-धीरे सूर्य के समीप पहुंचने लगता है यही प्रक्रिया चन्द्रलोक मे सूर्य का प्रकाश बढ़ाने का काम करती है। धर्म पंचांगो के अनुसार सूर्य तथा चन्द्रमा अमावस्या तिथि को सूर्य तथा चन्द्रमा अर्थात् राजा और रानी चन्द्र ग्रह एक ही राशि कन्या मे विराजमान होते हैं सूर्य अमावस्या के दिन चन्द्रमा से ठीक ऊपर होता है इसी दिन पितरो का मध्यान्हकाल भी होता है यही वजह है कि अपने पूर्वजों के प्रति असीम श्रद्धा के लिये अमावस्या अति उत्तम तिथि है।

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