बीते दिनों हुई बेमौसम बारिश व तेज हवा ने किसानों के होश फाख्ता कर दिए हैं। खरीफ के मौसम से लेकर अभी तक हुई फसलों की क्षति की भरपाई लघु एवं मध्यम वर्ग के लिए दिखा स्वप्न साबित हो रहा है, प्रकृति की मार से किसानों ने खून पसीने की कमाई लगाकर किसान रबी की फसल की बुआई की, लेकिन प्राकृतिक आपदा ने किसानों की मंशा को धराशायी कर बदहाली की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया।
यूं तो किसानों की समस्याओं को लेकर उत्तर प्रदेश शासन व केंद्र सरकार कई कल्याणकारी योजनाओं को किसान हित में परोस रही है, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर किसानों के हित की योजनाएं छलावा साबित हो रही हैं।
सच तो यह है कि किसानों के लिए पारदर्शी के बजाय ‘मिक्स’ योजनाएं परोसी जा रही है, जिससे वे ‘कन्फ्यूज’ हो रहे हैं और इसका लाभ सरकारी तंत्र के लोगों या बचैलियों को मिल रहा है। बची-खुची फसलों पर नील गायों ने कहर बरपा रहे है, जिससे किसानों की कमर टूटती दिख रही है।
प्राकृतिक आपदाओं में हुए नुकसान के आकलन के लिए अभी तक कोई भी सरकारी अमला किसानों के खेतों तक नहीं पहुंचा है। क्षेत्रीय कृषक चिंतित हैं और इस बीच क्षेत्र के ऐंजर, पूरे हनुमान दूबे का पुरवा, देवरा, टड़रसा, परसौली, पडरे, पीरो सरैया जैसे गांवों में नील गायों के आतंक से भी किसानों की नींद हराम है।
किसानों का कहना है कि उन्होंने ऊंचे दामों में खाद, बीज पानी व दवा का उपयोग कर फसलों को संजोया था, लेकिन बेमौसम बारिश व तेज हवा ने किसानों की गाढ़ी कमाई पर पानी फेर दिया। महंगाई के इस दौर में वे परिवार चलाएं तो कैसे।
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