झांसी, 27 फरवरी (आईएएनएस)। ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह ने सूखे की त्रासदी क्षेत्र झेल रहे बुंदेलखंड क्षेत्र में आत्महत्याओं की संख्या बढ़ने की आशंका जताई है। उनका कहना है कि समस्याओं से जूझते किसान अपने आपको लाचार और अकेला पा रहे हैं, लिहाजा वे आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं।
झांसी, 27 फरवरी (आईएएनएस)। ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह ने सूखे की त्रासदी क्षेत्र झेल रहे बुंदेलखंड क्षेत्र में आत्महत्याओं की संख्या बढ़ने की आशंका जताई है। उनका कहना है कि समस्याओं से जूझते किसान अपने आपको लाचार और अकेला पा रहे हैं, लिहाजा वे आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं।
बुंदेलखंड के सूखे की स्थिति और उनसे निपटने के मसले पर विस्तृत चर्चा के लिए झांसी में ‘बुंदेलखंड की परिस्थितिकीय और अर्थव्यवस्था पुनर्जीवन’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में हिस्सा लेने आए सिंह ने आईएएनएस से कहा कि आत्महत्या किसी का शौक नहीं है और आत्महत्या किसी समस्या का समाधान भी नहीं है।
उन्होंने कहा कि यह समझना होगा कि कोई व्यक्ति आत्महत्या तब करता है, जब उसे हर तरफ से निराशा हाथ लगती है, वह हर तरह से लाचार हो जाता है, दूर-दूर तक आशा की कोई किरण नजर नहीं आती। यह पहली बार दिखा है कि देश में पानी की किल्लत के कारण आत्महत्याएं हो रही हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने आगे कहा कि बीते सौ वर्षो में पहली बार ऐसा सूखा पड़ा है, आदमी को खाने के लिए अनाज और जानवर के लिए चारा व पानी नहीं है। किसान में इस समस्या से निपटने की ताकत नहीं रही। उसके भीतर सूखे का डर समा गया है। किसान और बुंदेलखंड इससे उबरे, इसके लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्य करना होगा।
उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ते हुए कहा कि एक तरफ जहां सामाजिक कार्य करने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक पक्ष के जरिए लोगों को संकट से लड़ने के लिए मानसिक तौर पर तैयार करना होगा। इन दोनों ही पक्षों पर काम करने की जरूरत है।
जलपुरुष ने कहा कि जहां तक सरकार की बात है, तो उसका काम है परेशान लोगों की मदद करना और समाज की जिम्मेदारी है लोगों में विश्वास पैदा करना। ये ही दोनों मिलकर बुंदेलखंड के सूखे को मिटा सकते हैं।
बुंदेलखंड में बढ़ती आत्महत्याओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसे रोकना है तो किसानों में यह विश्वास जगाना होगा कि समाज उनके साथ है। अगर ऐसा हो जाए तो आत्महत्याओं पर अंकुश लगाया जा सकता है और ऐसा नहीं हुआ तो आत्महत्याओं की संख्या बढ़ना तय है।
एक सवाल के जवाब में सिंह ने कहा कि कुछ ताकतें प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना चाहती है, जिनकी संख्या बहुत कम है। कई देश बेपानी हो गए हैं और वहां लोगों को उजाड़ने के लिए उन्हें आतंकी करार दिया जा रहा है। इसका उदाहरण कंबोडिया जैसे देश हैं। बीते 11 माह में 27 देशों की यात्रा करने के बाद ऐसा उन्होंने महसूस किया है।
बुंदेलखंड में कुछ उत्तर प्रदेश के और कुछ मध्य प्रदेश के, कुल 13 जिले आते हैं और लगभग सभी जिलों की कमोवेश एक जैसी ही हालत है। खेत वीरान पड़े हैं, कुओं में पानी नहीं है, तालाब सूख चुके हैं और पलायन जारी है। यहां इंसान के साथ मवेशी भी मुसीबत में हैं, क्योंकि उनके लिए चारा और पानी का संकट है। बेबस किसानों ने उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया है।
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